मालदेव से खौफजदा शेरशाह को ये कहना पड़ा - “बोल्यो सूरी बैन यूं, गिरी घाट घमसाण, मुठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण”

इतिहास हमेशा उन्हे याद रखता हैं जो अपनी माटी के लिए दुश्मनों से लड़ जाए अपनी आन के लिए दुश्मनो से भीड़ जाए. उन्हे नाको चने चबाने पर मजबूर कर दे. ऐसा ही राजा थे जोधपुर के राजा मालदेव.
मालदेव से खौफजदा शेरशाह को ये कहना पड़ा - “बोल्यो सूरी बैन यूं, गिरी घाट घमसाण, मुठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण”

राव मालदेव और शेरशाह सूरी

इतिहासकार मानते है की शेर शाह सूरी का जन्म सन् 1472 में और उनकी मृत्यु 22 मई 1545 में हुई. तारीख-ए-शेरशाही में एक स्थान का जिक्र होता है कि फरीद खान यानी शेर शाह सूरी ने अपनी सौतेली मां के कहने पर अपनी पूरी जागीरदारी छोड़ दी थी. इतिहास के पन्नों को अगर खंगाला जाए तो उसमें शेर शाह सूरी का नाम दर्ज है, जिसे उसकी वीरता, परिश्रम के बल पर दिल्ली की सल्तनत पर क़ब्जा करना और अदम्य साहस के लिए जाना पहचाना जाता है.

वैसे तो शेरशाह से जुडे कई किस्से कहानियां है जो सूरी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालती है. कहा जाता है की पहले बंगाल और फिर मालवा जीतने के बाद शेरशाह ने मारवाड़ की तरफ अपने कदम बढ़ाए. अपनी सल्तनत को खड़ा रखने के लिए उनका मारवाड़ पर कब्जा जरूरी था. 1543 के साल में उसने मारवाड़ की और कूच किया.

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव और शेरशाह सूरी</p></div>
झारखंड में बस और ट्रक भिड़त में 10 की मौत, 40 से ज्यादा लोग थे बस में सवार

1460 में मारवाड़ के शासक राव जोधा ने ‘चिड़िया टूंक’ की पहाड़ी पर मेहरानगढ़ का किला बनवाया और आस-पास अगल-बगल नया शहर बसाया था जोधपुर. इससे पहले मारवाड़ की राजधानी मंडोर हुआ करती थी. मंडोर के साथ परेशानी थी कि किला समतल जमीन पर बना हुआ था. पहाड़ी किलो सुरक्षा के लिहाज से काफी बेहतर होते हैं. वही अगर आप पहाड़ी पर मौजूद है तो आप नीचे से हमला करने वाली सेना से मुकाबला कर सकते है.

आज हम शेर शाह सूरी की जिंदगी एक ऐसे किस्सा लेकर आए है जो बेहद दिलचस्प है.

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव जोधपुर के शासक</p></div>

राव मालदेव जोधपुर के शासक

झज्जर जीतने के बाद दिल्ली से 30 मील दूर थे मालदेव -

सुमेल की लड़ाई, जो वीर राजपूतों और शेर शाह सूरी के बीच हुई थी, वो लड़ाई इस बात का गवाह थी कि राजपूतों की बहादूरी का दूसरा पर्याय है. जब खानवा की लड़ाई में राणा सांगा बाबर से हार के बाद अपना वैभव खो बैठे थे. उसी समय शेर शाह राजपूताना पर कब्ज़ा करने की नियत से आगे बढ़ा. उसके सामने जोधपुर के राजा मालदेव युद्ध में थे. मालदेव ने नागौर, अजमेर, मेड़ता, बीकानेर, जैतारण और टोंक के साथ उन्होंने झज्जर को भी सीमा में मिलाया. अब मालदेव दिल्ली से केवल 30 मील ही दूर थे।

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव जोधपुर के शासक</p></div>

राव मालदेव जोधपुर के शासक

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव और शेरशाह सूरी</p></div>
प्रधानमंत्री मोदी की पंजाब रैली को लेकर बना विशाल पंडाल , जानिए किसानों की क्या रहेगी रणनीति

मालदेव के पराक्रम से हार के करीब था शेर शाह सूरी –

मालदेव दिल्ली के करीब थे. अब सूरी के लिए मालदेव से युद्ध करना ज़रुर हो गया था. दोनों के बीच यह युद्ध 4 जनवरी 1544 में राजस्थान के पाली जिले के जैतारण में लड़ा गया। मालदेव की युद्ध नीति और साहस के कारण शाह अपनी हार के बेहद करीब आ गया था। लड़ते-लड़ते रात हो गई थी। तभी कुछ ऐसा घटा कि मालदेव अपनी सेना पर अविश्वास करके अंधेरी रात में ही चले गए थे.

<div class="paragraphs"><p>फाइल फोटो</p></div>

फाइल फोटो

20 हजार सैनिकों ने सूरी के 80 हजार सैनिकों के छुडाए थे छक्के -

इतिहासकार मानते है की उस रात रणभूमि में अभी भी रणबांकुरों ने महावीर राव खीवकरण, राव जैता, राव पांचायण, राव कुंपा और राव अखेराज के सानिध्य में मारवाड़ के केवल 20 हजार सैनिक खड़े थे. राजपूतों के केवल 20 हज़ार सैनिकों ने सूरी के 80 हज़ार सैनिकों के नाक में दम कर दिया था. अपने राजा के प्रति वफादार और अपने अदम्य साहस से राजपूतों सेना के 20 हजार सैनिकों ने दिल्ली पर ऐसा हमला किया कि दिल्ली की गद्दी हिल गई. दिल्ली में हाहाकार मच गया.

हमला इतना जबरदस्त था कि शेर शाह सूरी को मैदान छोड़ कर जाना पड़ा. जंग अंत की और थी लेकिन तभी शेर शाह के सेनापति खवास खान मारवात ने राव जैता और राव कुंपा को मारकर जंग का रुख अपनी और कर लिया. इस लड़ाई में इतनी तबाही हुई थी शेर शाह को कहना पड़ा - “बोल्यो सूरी बैन यूं, गिरी घाट घमसाण, मुठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण.”

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव और शेरशाह सूरी</p></div>
कौन है भगवंत मान? जिन्हें आम आदमी पार्टी का चेहरा बनाने की चर्चा चल रही पंजाब में...
<div class="paragraphs"><p>शेर शाह सूरी</p></div>

शेर शाह सूरी

कौन था शेर शाह सूरी –

सन् 1540 से 1545 के बीच की बात है. जब दिल्ली सल्तनत में एक अफगानी शेरशाह सूरी का कद किसी स्वर्ण अक्षरो से कम नहीं था. सूरी के पिता पिता हरियाणा की छोटी सी जागीर नारनौल के जागीरदार थे. बचपन में सूरी का नाम फरीद खान था. शिकार के समय बिहार के मुगल गवर्नर बहार खान पर एक शेर ने हमला किया. नौजवान अफगान फरीद ने उस शेर को अपनी नंगी तलवार से मार गिराया और उसी से उन्हे नया नाम मिला, ‘शेरशाह’. शेर शाह ने दिल्ली का तख़्त अपने दम पर हासिल किया था.

Like Follow us on :- Twitter | Facebook | Instagram | YouTube

<div class="paragraphs"><p>राव मालदेव और शेरशाह सूरी</p></div>
एलोन मस्क की स्पेसएक्स ने रचा इतिहास: पहली बार 4 आम नागरिक स्पेस में गए, 3 दिन वहीं रहेंगे

Related Stories

No stories found.