विश्व हिंदी दिवस: मातृ भाषा हिंदी क्या बन गई दोएम दर्जे की भाषा, फसाने से हकीकत तक का पूरा सच

जो लोग अपनी भाषा को सौंदर्य को कोने-कोने देश के साथ ही विदेशों में पहुचाने का काम कर रहे है। उन लोगों को ही देश में सम्मान नहीं मिल पा रहा है। राजस्थान के उदयपुर में राजस्थान साहित्य अकादमी के हालात देखे तो काफी चिंताजन है।
विश्व हिंदी दिवस: मातृ भाषा हिंदी क्या बन गई दोएम दर्जे की भाषा, फसाने से हकीकत तक का पूरा सच

विश्व हिंदी दिवस

डेस्क न्यूज. हिंदी है हम वतन के... ये लाइन तो हमने खुब सुनी है और शायद इसको हमने गुनगुनाया भी होगा। हमें अपनी हिंदी भाषा पर खुब गर्व है लेकिन आखिर हिंदी भाषा को वो सम्मान हम दे पाते है जिसकी वो हकदार है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि लगातार हिंदी भाषा और एससे जुड़े लोगों की तौहीन हो रही है ऐसा क्यों कहा जा रहा है तो आपको ये बात भी विस्तार से बताते है।

हिंदी साहित्यकारों को 3 साल से है सम्मान का इंतजार

हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, जागरूकता और हिंदी भाषा को अंतराष्ट्रीय दर्जा दिलाने के लिए आज के दिन अंतराष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन आज जो लोग अपनी भाषा को सौंदर्य को कोने-कोने देश के साथ ही विदेशों में पहुचाने का काम कर रहे है। उन लोगों को ही देश में सम्मान नहीं मिल पा रहा है। राजस्थान के उदयपुर में राजस्थान साहित्य अकादमी के हालात देखे तो काफी चिंताजन है। बिना अध्यक्ष और संवैधानिक समिति के काम हो रहा है। इसके चलते ही यहां पर होने वाले सम्मान का आयोजन भी नहीं हो पा रहा है। पिछले तीन साल से सम्मान के इंतजार में साहित्यकार बैठे है।

इस आकादमी से नामी हस्तियां का जुड़ाव रहा है

राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष निरंजननाथ आचार्य इस आकादमी से जुड़े रहे है। इसी के साथ ही डॉ. रांगेय राघव, डॉ. आलमशाह खान, नंद भारद्वाज, नंद चतुर्वदी, नवल किशोर के साथ-साथ कई साहित्यकार इस आकादमी में रह चुके है।

क्या सियासत का शिकार है उदयपुर की साहित्य आकादमी

डॉ. प्रकाश आतुर जब यहां पर अध्यक्ष रहे थे तो उनके समय में साहित्यकारों का कोई परेशानी नहीं हुई। यहीं कारण रहा की उनके कार्यकाल को स्वर्णिम माना जाता है। लेकिन अब लगता है कि ये आकादमी राजनीति का शिकार हो गई है। राजनीति के चलते यहां पर 3 साल से अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पह रहा है।

क्या सियासत का शिकार है उदयपुर की साहित्य आकादमी

डॉ. प्रकाश आतुर जब यहां पर अध्यक्ष रहे थे तो उनके समय में साहित्यकारों का कोई परेशानी नहीं हुई। यहीं कारण रहा की उनके कार्यकाल को स्वर्णिम माना जाता है। लेकिन अब लगता है कि ये आकादमी राजनीति का शिकार हो गई है। राजनीति के चलते यहां पर 3 साल से अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पह रहा है।

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