लहू, आंसू और मौत की त्रासदियों से मिलकर बना बारबाडोस का इतिहास

आज हम आपको बता रहे है, आखिर कैसा है बारबाडोस का पूरा इतिहास? आज़ाद होने के बाद भी उसे ब्रिटिश शासन के दखल से मुक्ति क्यों नहीं मिल पाई? अब जाकर उसका ब्रिटेन से मोहभंग क्यों हुआ? और बताएंगे, राजतंत्र और गणतंत्र में आखिर क्या अंतर है?
लहू, आंसू और मौत की त्रासदियों से मिलकर बना बारबाडोस का इतिहास
बारबाडोस की आजादी

रिपब्लिक बारबाडोस अपने नए मिशन पर निकल चुका है. मैं ईश्वर से कामना करती हूं कि वो सभी तूफ़ानों से जूझते हुए हमारे मुल्क़ को मंज़िल तक पहुंचाए.

डेमा सेंड्रा मेसन, राष्ट्रपति, बारबाडोस

कैरेबियन सागर में एक द्वीप मौजूद है. बारबाडोस. जबरदस्त क्रिकेटरों का देश. विश्व के कुछ दिग्गज खिलाड़ी सर गैरी सॉबर्स, मैल्कम मार्शल, गॉर्डन ग्रीनिज़ का जन्म यहीं हुआ. बाकी मानकों पर भी ये देश पहली कतार में खडा दिखा. लेकिन कुछ दशकों पहले तक ऐसा नहीं था. ग़ुलामी और दमन दो इसके अभिन्न अंग थे. बारबाडोस के इतिहास की बात करें तो वहां का इतिहास लहू, आंसू और मौत की त्रासदियों से मिलकर बना हुआ है. इस दास्तान का पहला और आखरी विलेन है ब्रिटेन.

आज हम आपको बता रहे है, आखिर कैसा है बारबाडोस का पूरा इतिहास? आज़ाद होने के बाद भी उसे ब्रिटिश शासन के दखल से मुक्ति क्यों नहीं मिल पाई? अब जाकर उसका ब्रिटेन से मोहभंग क्यों हुआ? और बताएंगे, राजतंत्र और गणतंत्र में आखिर क्या अंतर है?

बात है साल 1625 की. दिन था 14 मई. इंग्लैंड का एक जहाज समंदर में रास्ता भटक गया. जहाज के कप्तान जॉन पॉवेल और उनके साथी की ब्राज़ील से घर वापसी हो रही थी. लेकिन रास्ता भटकने के बाद वे एक वीरान द्वीप पर पहुंच गए. जहां उन्हे लगा की यह खाली जमीन है. वहा कोई जमीन का दावेदार दिखाई नहीं दिया. ‘जो संपत्ति किसी की नहीं, वो हमारी हैं, की तर्ज़ पर जॉन ने उस जगह पर ब्रिटेन का झंडा लगा दिया.

सवाल उठता है की क्या ब्रिटिश उस द्वीप पर पहुंचने वाले पहले यूरोपियन थे? बिल्कुल नहीं. ब्रिटेन के आने से काफी पहले पुर्तगाली उस द्वीप पर कदम रख चुके थे. जब वो वहां तट पर उतरे तो उन्हें अंजीर के बड़े-बड़े पेड़ दिखे. इन पेड़ों की पत्तियां मिलकर दाढ़ी की आकृति बना रहीं थी. इसी बीच उन्होंने द्वीप का नामकरण किया. लॉस बारबाडोस. यानी दाढ़ी वाला द्वीप.

कहा जाता है कि पुर्तगालियों का सामना बड़ी दाढ़ी रखने वाले लोगों से हुआ. इस वजह से उन्होंने इसे बारबाडोस का नाम दिया. खैर, सच जो रहा हो, बारबाडोस बाहरी दुनिया के नजर में आ चुका था.

जॉन पॉवेल ने इस तलाश की जानकारी अपने सरदार को दी. सरदार बहुत खुश हुआ. सरदार ने आदेश दिया, जाओ और वहां नई कॉलोनी बसाओ. पॉवेल बारबाडोस के लिए निकला ज़रूर, लेकिन कभी पहुंच नहीं पाया. वो बीच में दूसरे काम में फंस गया. फिर सरदार ने जॉन के भाई हेनरी से बात की. तब हेनरी ने कहा, भाई के सपने को मैं पूरा करूंगा.

फ़रवरी 1627 में हेनरी पॉवेल 80 सेटलर्स और 10 ग़ुलामों को लेकर बारबाडोस पहुंचा. अंग्रेज़ों के आने से पहले बारबाडोस के जंगलों में अरावाक क़बीले रहा करते थे. 17 वीं सदी ईसापूर्व वे लोग वेनुज़ुएला से आए थे.

इतिहास तो हमसे शुरू होता है. तुम कौन? – अंग्रेज़ों ने कहा

वहां पहुंचने के बाद उन्होने अरावाक क़बीले का नामोनिशान मिटा दिया. अब अंग्रेज़ बता सकते थे कि बारबाडोस को उन्होंने ही बसाया.

इस सफ़ाई को देकर अंग्रेज़ों ने अपनी गाड़ी आगे बढ़ाई. ब्रिटिश सजा काट रहे लोगों और ग़रीब लोगों को अपने देश से बाहर भेज रहा था. कुछ लोग बारबाडोस भी लाए गए. नई कॉलोनी बन तो रही थी, लेकिन ब्रिटेन को उससे कुछ ज्यादा खास फायदा नहीं हुआ. क्योकी वहां कोई क़ीमती धातु नहीं मिली. इससे हेनरी पॉवेल को झटका लगा. जब उसने आसपास में जानकारी ली तो पता चला कि बारबाडोस गन्ने की खेती के लिए सही जगह है.

उस समय ब्रिटेन में चीनी कि कीमत हीरे के बराबर मानी जाती थी. उस समय चीनी को ‘उजला सोना’ कहा जाता था. अच्छी फसल मतलब पैसा ही पैसा. गन्ने की खेती के लिए मज़दूरों की दरकार थी. ब्रिटेन, अफ़्रीका से ग़ुलामों को लेकर आया. ग़ुलामों के ख़ून-पसीने से गन्ने की खेती अच्छी हुई और चल निकली और बारबाडोस बाकी कॉलोनियों की तुलना में ज्यादा फायदा देने लगा साथ ही वह ब्रिटिश कल्चर को भी अपना रहे थे. इसलिए, अंग्रेज़ों ने बारबाडोस को ‘लिटिल इंग्लैंड’ नाम दिया.

उस समय बारबाडोस में माहौल शांतिपूर्ण था. साल 1642. इंग्लैंड में सिविल वॉर शुरू हुआ. उस समय इंग्लैंड के राजा थे, चार्ल्स प्रथम. सिविल वॉर के बीच में उनका तख़्तापलट हुआ. चार्ल्स प्रथम को कुर्सी से बेदखल करने वाला उनका ही मातहत था. ओलिवर क्रॉमवेल.

जब ब्रिटेन में तख़्तापलट हुआ तो इसका असर बारबाडोस पर भी हुआ. वहां सत्ता-प्रतिष्ठान दो गुटों में बंट गया. एक पक्ष चार्ल्स प्रथम के समर्थन में तो दूसरा क्रॉमवेल की वक़ालत कर रहा था.

इस झगड़े में चार्ल्स के धड़े ने बाजी मारी औऱ बारबाडोस के तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड फ़्रांसिस विलोबी ने इंग्लैंड से आजादी का ऐलान हो गया. लेकिन ब्रिटिश पार्लियामेंट पर क्रॉमवेल का नियंत्रण था. संसद ने विलोबी और उनके समर्थकों को गद्दार घोषित कर बारबाडोस के किसी भी देश से व्यापार पर रोक लगा दी. इसके बाद विरोध को दबाने के लिए ब्रिटेन की रॉयल नेवी को रवाना किया गया.

अक्टूबर 1651 में ब्रिटिश नेवी ने बारबाडोस को घेरे में लिया औऱ लड़ाई हुई, लेकिन विलोबी की सेना उन्नीस साबित हुई. अतं में विलोबी को सरेंडर करना पड़ा. बारबाडोस एक बार फिर ब्रिटेन के नियंत्रण में आया.

विलोबी का विद्रोह स्वार्थपूर्ति से जुड़ा हुआ था. उसमें अश्वेत ग़ुलामों के लिए कुछ भी नहीं था. फिर भी इस घटना ने सताए लोगों को प्रेरणा दी. उन्हें बार-बार हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने शोषकों के ख़िलाफ़ लड़ाई धीमी नहीं पड़ने दी.

बारबाडोस के इतिहास में अश्वेतों का सबसे बड़ा विद्रोह -

बात नवंबर 1815 की. बारबाडोस की असेंबली में इम्पीरियल रजिस्ट्री बिल लाने की बात चली. जिसके तहत ग़ुलामों का रजिस्ट्रेशन किया जाना था. ग़ुलामों को लगा कि इससे उन्हें आज़ादी मिल जाएगी. लेकिन वो बिल चर्चा के बाद रिजेक्ट कर दिया गया.

इससे ग़ुलाम दहशत में आ गए. उन्हें महसूस हुआ कि वे कभी आज़ाद नहीं हो पाएंगे. इस डर से ग़ुलामों ने विद्रोह का प्लान तैयार किया. इसमें अलग-अलग प्लान्टेशन्स से लीडर्स चुने गए. वे छिपकर जमा होते और आगे की प्लानिंग करते.

उनकी ये प्लानिंग कई महीनों तक चली. आख़िरकार, अप्रैल 1816 में ईस्टर संडे की रात उन्होंने अपना काम शुरू किया. सबसे पहले सेंट फ़िलिप में खेत में आग लगाई गई. ये विद्रोह की शुरुआत का संकेत था. जल्दी ही ये आग पूरे बारबाडोस में फैल गई. गोरे अंग्रेज़ मालिक राजधानी ब्रिज़टाउन भाग गए. तीन दिनों तक तांडव चला.

बाद में मार्शल लॉ का ऐलान किया गया. जिसमें ब्रिटिश आर्मी और किराए के लठैतों ने मिलकर विद्रोह को दबा दिया. जिसके बाद दमन का वीभत्स दौर चला. बारबाडोस में 80 दिनों तक मार्शल लॉ लागू रहा. इस दौरान 200 से अधिक ग़ुलामों को मौत की सज़ा दी गई और उतने ही लोगों को देश निकाला दिया गया.

हुए विद्रोह में सबसे ख़ास आदमी था, बुसा. उसे अफ़्रीका से लाया गया था. कहा जाता है कि उसी ने पूरी क्रांति का नेतृत्व किया और उसी के नाम पर 1816 की क्रांति को ‘बुसा विद्रोह’ नाम दिया गया.

बुसा विद्रोह के बाद भी ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ दो और बड़े विद्रोह हुए. लेकिन वे असफ़ल साबित हुए. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के लिए कॉलोनियों में शासन करना मुश्किल साबित हो रहा था. 30 नवंबर 1966 को ब्रिटेन ने बारबाडोस को आज़ाद कर दिया.

लेकिन उसमें एक पेच कायम रहा. बारबाडोस को आज़ादी तो मिल गई थी. लेकिन कई चीज़ों में ब्रिटेन का दखल अभी भी बरकरार रहा. इसमें सबसे बड़ा था, हेड ऑफ़ द स्टेट का पद. ये पद ब्रिटिश क्राउन के पास बना रहा.

बारबाडोस की आजादी
बारबाडोस की आजादी

ब्रिटेन से 55 बरस बाद तोड़ा बारबाडोस ने नाता -

आज़ाद होने के 55 बरस बाद बारबाडोस ने ब्रिटेन से पूरी तरह से अलग हो गया है. अब से ब्रिटिश क्राउन बारबाडोस का हेड ऑफ़ द स्टेट नहीं रहेगा. बारबाडोस दुनिया का सबसे नया गणतंत्र बना है. गणतंत्र की एक सरल परिभाषा है. गणतंत्र में राष्ट्र का अध्यक्ष जनता या जनता के प्रतिनिधि के द्वारा चुना जाता है. गणतंत्र में हेड ऑफ़ द स्टेट का पद वंशागुनत नहीं होता.

30 नवंबर को बारबाडोस की राजधानी ब्रिज़टाउन में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसमें डेमा सेंड्रा मेसन को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई. इससे पहले वो गवर्नर-जनरल के पद पर थीं.

उन्होंने अपने भाषण में कहा,

रिपब्लिक बारबाडोस अपने नए मिशन पर निकल चुका है. मैं ईश्वर से कामना करती हूं कि वो सभी तूफ़ानों से जूझते हुए हमारे मुल्क़ को मंज़िल तक पहुंचाए.

इस मौके पर ब्रिटेन के प्रतिनिधि के तौर पर प्रिंस चार्ल्स आए. उन्होंने कहा,

इतिहास के अंधकार भरे दिनों और ग़ुलामी के दर्दनाक अत्याचार हमारे इतिहास का दाग हैं. बारबाडोस के लोगों ने उस दौर को भुलाकर अपने लिए एक नया मुकाम चुना है. उन्हें शुभकामनाएं.

बारबाडोस का ब्रिटेन से मोहभंग होने का कारण कोरोना के समय शुरू हुआ. बारबाडोस का आरोप था कि सदियों तक मेवा खाने के बावजूद ज़रूरत के वक़्त ब्रिटेन ने मदद से हाथ पीछे खींच लिया. आबादी का एक धड़ा मानता है कि अगर हमें अपने ही दम पर सबकुछ करना है, तो सांकेतिक शासन क्यों बना रहे. सितंबर 2021 में इसका ऐलान किया गया और आज़ादी की 55वीं सालगिरह के मौके पर इस प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया गया.

बारबाडोस की आबादी की बात करें तो वहां की आबादी तीन लाख है. वो कैरेबियन के सबसे संपन्न देशों में गिना जाता है. कैरेबियन में अभी भी कई देश ऐसे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश क्राउन को राष्ट्राध्यक्ष का दर्ज़ा दे रखा है. बारबाडोस के बाहर निकलने के बाद वे भी नई राहें तलाशेंगे.

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