Mother's Day 2022: मां जिन्होंने लिख दिया नया इतिहास,युगों युगों तक वक्त इन्हें करता रहेगा सलाम

Mother's Day 2022: इस मदर्स डे जानिए इतिहास से जुड़ी कुछ ऐसी ही मांओं के बारे में जिन्होंने किसी राज्य की रानी, किसी महल की दासी होते हुए भी मां होने की भूमिका इस कदर निभाई की आज भी उनके चर्चें कम नहीं हुए।
Mother's Day 2022: मां जिन्होंने लिख दिया नया इतिहास,युगों युगों तक वक्त इन्हें करता रहेगा सलाम
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Mother's Day 2022: ‘मां’ एक ऐसा शब्द जिसके चारों और हमारी छोटी सी दुनिया बसी हुई है। एक मां अपने बच्चे के लिए सभी मुश्किलों का सामना कर सकती है फिर वो चाहें एक रानी हो या एक दासी। मां की ममता कभी भी किसी बड़े पद की मोहताज नहीं होती। आज के इस आर्टिकल में हम इतिहास से जुड़ी कुछ ऐसी ही मांओं के बारे में चर्चा करेंगे जिन्होंने किसी राज्य की रानी, किसी महल की दासी होते हुए भी मां होने की भूमिका इस कदर निभाई की आज भी उनके चर्चें कम नहीं हुए। मां के त्याग, बलिदान की बात होने पर सबसे पहले इन्हीं मांओं को याद किया जाता है। तो चलिए जानते है ऐसी ही कुछ खास मांओं के बारे में...

पन्ना धाय- त्याग, बलिदान का अमूर्त रुप

मां के त्याग और बलिदान की बात हो और ज़हन में पन्ना धाय (Panna Dai) का नाम ना आए ऐसा हो नहीं सकता। ये इतिहास की एक ऐसी मां है जिन्होंने अपना स्वामी धर्म निभाने के लिए अपने सगे बेटे को शत्रु के समक्ष पेश कर दिया था।

पन्ना धाय
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पन्ना मेवाड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र उदयसिंह की धाय मां थी। चित्तौड़ का शासक बनने की लालसा रखने वाले दासी पुत्र बनवीर से उदयसिंह को बचाने के लिए इन्होंने उदयसिंह को झूठी पत्तल में रख महल के बाहर भिजवा दिया और उनके स्थान पर अपने पुत्र को सुला दिया। बनवीर ने पन्ना की आखों के सामने तलवार से चंदन को उदयसिंह समझ कर उसकी हत्या कर दी। स्वामी धर्म निभाने के लिए अपने पुत्र को अपने हाथों से शत्रु को सौपने वाली इस मां का कलेजा इतना बलवान था कि यह कभी भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटी। उदयसिंह को बनवीर से बचाने के लिए पन्ना काफी समय तक कुंभलगढ़ के जगंलों में भटकती रही। पन्ना ने धाय मां होते हुए भी एक मां की पूरी जिम्मेदारी निभाई। वर्तमान में राज्य सरकार इनके नाम पर सरकार पन्नाधाय जीवन अमृत योजना भी चला रही है, जो कि महिलाओं के लिए विशेष रुप से लाई गई है।

रानी लक्ष्मी बाई – अतिंम सांस तक अपने बेटे को पीठ पर बांधे शत्रुओं से लड़ती रही

रानी लक्ष्मी बाई को उनकी वीरता के लिए जाना जाता है। लक्ष्मी बाई इतिहास की यह पहली महिला थी जो कभी अंग्रेजों के सामने झुकी नहीं, बल्कि उनकी आखों से आखें मिलाकर अपनी अंतिम सांस तक देश की आजादी तक लड़ती रही।

रानी लक्ष्मी बाई
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रानी लक्ष्मी बाई न सिर्फ एक अच्छी रानी रहीं बल्कि ये एक अच्छी मां भी थी। 1851 में बाल गंगाधर राव और रानी लक्ष्मी बाई को अपने पुत्र रत्न की प्राप्ती हुई पर कुछ ही महिनों में उसका निधन हो गया। गंगाधर राव ने दामोदर राव को गोद लिया था। पुत्र वियोग में बाल गंगाधर की मृत्यु हो गई, पर रानी लक्ष्मी बाई ने हिम्मत नहीं हारी और अच्छे से शासन और जनता को संभाला।

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था। अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को उसका हक दिलाने के रानी लक्ष्मी बाई हमेशा अंग्रेजों के समक्ष डट कर खड़ी रही। 1857 कि क्रांति में विरांगना लक्ष्मी बाई अपने पुत्र दामोदर को अपनी पीठ पर बाधंकर लड़ती रही। रानी की गरीमा इतनी थी की उसने शत्रु को खुदको और अपने पुत्र को स्पर्श तक नहीं करने दिया। देश को आजादी दिलाने की इस जंग में रानी अपने पुत्र के साथ ही शहीद हो गई।

जीजा बाई – आत्मसम्मान और मूल्यों को रखा सर्वोपरि

जीजाबाई महान मराठा शासक और योद्धा शिवाजी की माताजी थी। जीजाबाई को एक प्रभावी और प्रतिबद्ध महिला थी जिन्होंने हमेशा अपने आत्मसम्मान और मूल्यों सर्वोपरि रखा। अपनी दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध जीजाबाई खुद एक योद्धा और प्रशासक थी।

शिवाजी की मां जीजा बाई
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अपने पुत्र शिवाजी राव में एक बेहतर योद्धा के गुणों को उन्होंने बचपन में ही पहचान लिया और उसी तरह उन्होंने शिवाजी का पालन पोषण किया। जीजा की देखरेख में शिवाजी ने मानवीय रिश्तों की अहमियत समझी, महिलाओं का मान-सम्मान, धार्मिक सहिष्णुता, और न्याय के साथ ही अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और महाराष्ट्र की आजादी की इच्छा बलवती हुई। जीजाबाई की जिंदगी में कई घटनाएं हुईं, कुछ अच्छी, कुछ बुरी और कुछ दर्दनाक। उन्होंने सबकुछ चुपचाप सहा। पति की मौत के बाद जीजा ने शिवाजी को महाराष्ट्र का शासक बनाया। जीजा और उसकी सिखाई सीख हर स्थिती में शिवाजी के साथ रही। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को दिया।

मदर टेरेसा – भारत में सैकड़ों लोगों की बनी मां

मेसेडोनिया देश में जन्मी ‘मदर टेरेसा’ ने भले हीं शादी न की हो पर दुनिया भर के सभी लोग इन्हें मां कहकर ही पुकारतें है। मदर टेरेसा एक नर्स थी, पर सभी इन्हें मां कहकर ही पुकारते थे। 18 वर्ष की उम्र में वो कोलकाता आयी थी और गरीब लोगों की सेवा करने के अपने जीवन के मिशन को जारी रखा। इन्होंने अपने मरीजों की एक मां की तरह देखभाल की। महामारी के समय भी ये अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटी, मरीजों की सेवा करते हुए ये खुद कुष्ठरोग से पीड़ित हो गई। 5 सितंबर 1997 में इनकी मौत हो गई।

मदर टेरेसा
मदर टेरेसा

मदर टेरेसा को मानव जाति के उत्कृष्ट सेवा के लिए, सितंबर 2016 में “संत” की उपाधि से सम्मानित किया गया था। 1979 में मदर टेरेसा को सेवा के लिए शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया था।

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