Mahabharata : महाभारत की ये पांच घटनाएं कोई नहीं भूल सकता 

महाभारत यूं तो असंख्या घटनाओं का एक संग्रह है। इसमें से अधिकतर घटनाएं जनमानस में प्रचलित है। उन अधिकतर में भी हम यहां आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कुछ ऐसी घटनाएं जिन्हें आज भी समय-समय पर प्रसंगवश याद किया जाता है। हालांकि और भी ऐसी घटनाएं है जिन्हें यहां लिखा जा सकता था।
Mahabharata : महाभारत की ये पांच घटनाएं कोई नहीं भूल सकता 

5 Stories From Mahabharata : महाभारत यूं तो असंख्या घटनाओं का एक संग्रह है।

इसमें से अधिकतर घटनाएं जनमानस में प्रचलित है। उन अधिकतर में भी हम यहां आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कुछ ऐसी घटनाएं जिन्हें आज भी समय-समय पर प्रसंगवश याद किया जाता है। हालांकि और भी ऐसी घटनाएं है जिन्हें यहां लिखा जा सकता था। जैसे द्रौपदी के स्वयंवर, गांधारी का शाप, शिखंडी का सहयोग, गीता का ज्ञान आदि।

1.एकलव्य की घटना :

5 Stories From Mahabharata : एकलव्य भगवान श्रीकृष्ण के पितृव्य (चाचा) के पुत्र थे जिसे बाल्यकाल में ​ज्योति​ष के आधार पर वनवासी भील राज निषादराज को सौंप दिया गया था।

महाभारत काल में प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। एकलव्य अपना अंगूठा दक्षिणा में नहीं देते या गुरु द्रोणाचार्य एकलव्य का अंगूठा दक्षिणा में नहीं मांगते तो इतिहास में एकलव्य का नाम नहीं होता।

गुरुद्रोणाचार्य ने भीष्मपितामह को वचन दिया था कि वे कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे और अर्जुन को वचन दिया था कि तुमसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं होगा। बस इस वचन की लाज रखने के कारण ही गुरुद्रोणाचार्य ने एकलव्य का अपना शिष्य नहीं बनाया और जब उन्हें पता चला कि एकलव्य तो सबकुछ सीख गया है। तब उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगुठा मांग लिया।

द्रोणाचार्य ने जिस अर्जुन को महान सिद्ध करने के लिए एकलव्य का अंगूठा कटवा दिया था, उसी अर्जुन के खिलाफ उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा और उसी अर्जुन के पुत्र की हत्या का कारण भी वे ही बने थे और उसी अर्जुन के साले के हाथों वे मृत्यु को प्राप्त हुए थे।

2.इंद्रप्रस्थ में दुर्योधन :

पांडव अपने रहने के लिए इंद्रप्रस्थ नामक एक शहर बसाते हैं और उसमें एक मायावी महल बनवाते हैं। यह महल मायावी असुर मयासुर बनाता है। इस महल की खासियत यह थी कि जहां पानी का ताल नजर आता था वहां फर्श होता था और जहां फर्श नजर आता था वहां पानी का ताल होता था। दुर्योधन के मन में भी इस महल को देखने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई।

वह जैसे ही महल के अंदर प्रवेश किया तो उसको एक भव्य हाल नजर आया। उस हाल में सुंदर फर्श लगा हुआ था और उपर गैलरी में द्रौपदी खड़ी हुई थी। दुर्योधन जैसे ही फर्श पर पैर रखता है वह पानी की ताल में गिर जाता है। दरअसल फर्श जैसा नजर आने वाला वह एक पानी का ताल ही होता है।

पानी का ताल अर्थात स्वीमिंग पूल। उपर गैलरी में देख रही द्रौपदी यह घटना देखकर खूब जोर से हंसती है और कहती है, 'अंधे का पुत्र अंधा।'…दुर्योधन इस घटना से बहुत शर्मिंदा होकर खुद को अपमानीत सा समझता है और मन ही मन द्रौपदी से बदला लेने की सोचने लगता है।

3.लाक्षागृह कांड :

शकुनी की नीति के तहत दुर्योधन ने पांडवों के रुकने के लिए एक ऐसा महल बनवाया था, जो लाख से बना थे जिसे बाद में लाक्षागृह कहा गया। दुर्योधन की योजना के अनुसार इस महल में रात में चुपचाप से आग लगा दी गई थी ताकि सोते हुए पांडवों की इस महल में ही जलकर मृत्यु हो जाए।

किन्तु पांडवों के जासूसों ने उन्हें इस योजना की सूचना देदी और वे रात को ही एक गुप्त सुरंग से निकल भागे। ये सुरंग आज भी है, जो हिंडन नदी के किनारे पर खुलती है। लाख से बनें महल के अवशेष आज भी बरनावा में पाए जाते हैं। यह बरनावा या वारणावत नामक स्थान मेरठ जिले में स्थित है।

4. भीम नहीं उठा पाएं थे हनुमानजी की पूंछ :

सभी को यह घटना तो मालूम ही होगी की बलशाली भीम हनुमानजी की पूंछ नहीं उठा पाए थे। दरअसल, भीम कुंति के कहने पर कमलदल लेने के लिए जंगल में एक रास्ते से जा रहे थे तभी उन्हें रास्ते में लेटे के वानर नजर आया।

भीम ने उसे वानर समझकर कहा कि, ऐ वानर! अपनी ये पूंछ हटाकर मुझे निकलने का रास्ता दो। वानर ने कहा कि तुम ही हटा लो पूंछ। भीम के लाख प्रयास के बाद भी जब पूंछ अपने स्थान से नहीं हटी तो भीम समझ गए कि ये कोई साधारण वानर नहीं है। भीम ने क्षमा मांगी।

कुछ विद्वान मानते हैं कि यह घटना गंधमादन पर्वत पर घटी थी। हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है।

5. रणछोड़दास : 

जरासंध ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए अपने मित्र कालयवन को बुलाया था। कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश कृष्ण के नाम संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में संदेश भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं। कालयवन ने स्वीकार कर लिया।

अक्रूरजी और बलरामजी ने कृष्ण को इसके लिए मना किया, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कालयवन को शिव द्वारा दिए वरदान के बारे में बताया और यह भी कहा कि उसे कोई भी हरा नहीं सकता। श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि कालयवन राजा मुचुकुंद द्वारा मृत्यु को प्राप्त होगा। मुचुकंद एक वरदान के चलते चिरनिद्रां में सो रहे है। उन्हें जो जगायेगा वह मृत्यु को प्राप्त होगा।
जब कालयवन और कृष्ण में द्वंद्व युद्ध का जय हो गया तब कालयवन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण तुरंत ही दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और कालयवन उन्हें पकडऩे के लिए उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा। इस प्रकार भगवान बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा। उसे देखकर कालयवन ने सोचा, मुझसे बचने के लिए श्रीकृष्ण इस तरह भेष बदलकर छुप गए हैं।

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