CM की कुर्सी के बाद अब उद्धव की शिवसेना की बारी

महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के 19 मे से 18 सांसदों का समर्थन प्राप्त करके शिवसेना पर दावा कर दिया है।
CM की कुर्सी के बाद अब उद्धव की शिवसेना की बारी

महाराष्ट्र के सियासी संकट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने नया दांव चल दिया है। शिवसेना पर दावा करते हुए शिंदे ने 12 सांसदों को लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाया है। शिंदे ने दावा किया है कि उन्हें शिवसेना के 19 में से 18 सांसदों का समर्थन प्राप्त है।

उद्धव ठाकरे ने मुंबई में बैठक बुलाई है। इस बैठक में पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है। साथ ही नगर निगम अध्यक्षों को भी इस बैठक में शामिल होने के निर्देश दिए गए है। उद्धव ठाकरे ने विधायकों की बगावत के बाद 29 जून को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

केंद्र ने 12 सांसदों को दी Y+ सुरक्षा

शिवसेना के 12 सांसदों को केंद्र सरकार ने Y+ सुरक्षा दी है। सूत्रों के मुताबिक, शिवसेना के 19 में से 12 सांसद लोकसभा में अलग गुट का दावा पेश कर सकते हैं। ये सांसद प्रधानमंत्री से भी मिल सकते है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर निगाहें

महाराष्ट्र संकट को लेकर अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट में होने वाली 20 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले खेमे और एकनाथ शिंदे खेमे की याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही शिवसेना की लड़ाई को नया मोड़ मिलेगा।

शिवसेना को लेकर शिंदे का तर्क?

शिवसेना के 40 विधायक और 13 सांसद मूल पार्टी (उद्धव की शिवसेना) से अलग हो चुके हैं। बागी गुट के नेता और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सांसदों और विधायकों की संख्या के आधार पर दावा किया है कि उनके पास दो तिहाई जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए असली शिवसेना अब उन्हीं की है।

यदि कार्यकारिणी की 21 जून को होने वाली अंतिम बैठक को आधार माना जाए तो उद्धव के पास कार्यकारिणी का बहुमत है, इसलिए यह बागियों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। इस बैठक में पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे फिर से चुने गए। सभी ने उद्धव ठाकरे को पार्टी के फैसले लेने का अधिकार दिया था।

बैठक में यह भी तय किया गया कि कोई और शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के नाम का इस्तेमाल नहीं करेगा। शिवसेना की स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने की थी। पार्टी को पहली बार 1979 में धनुष-बाण का चिन्ह मिला था। एकनाथ शिंदे मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे। शिंदे मुख्यमंत्री बनने के बाद दूसरी बार दिल्ली पहुंचे है।

शिवसेना संगठन की संरचना

शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी। उस समय यह एक क्षेत्रीय दल था। शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने 1976 में शिवसेना के संविधान का मसौदा तैयार किया था। इस संविधान के अनुसार, यह घोषित किया गया था कि सर्वोच्च पद यानी 'शिवसेना प्रमुख' के बाद 13 सदस्यों की कार्यकारी समिति पार्टी के संबंध में कोई भी निर्णय ले सकती है।

1989 में, चुनाव आयोग ने शिवसेना को राज्य स्तरीय पार्टी के रूप में 'धनुष तीर' चिन्ह दिया। 2003 में, राज ठाकरे ने महाबलेश्वर में एक बैठक में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का मुखिया बनाने का प्रस्ताव रखा। उस समय 282 सदस्यों के प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव को मंजूरी दी और उद्धव ठाकरे पार्टी प्रमुख बने। उसके बाद राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर मनसे पार्टी बनाई। उद्धव को बालासाहेब के समय पार्टी में नंबर-2 का स्थान दिया गया था। इससे नाराज होकर राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी।

शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों को पार्टी का 'नेता' कहा जाता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आदित्य ठाकरे, मनोहर जोशी, सुधीर जोशी, लीलाधर दाके, सुभाष देसाई, दिवाकर राउत, रामदास कदम, संजय राउत और गजानन कीर्तिकर शामिल हैं। उनमें से ज्यादातर अभी भी उद्धव के साथ हैं।

क्या है शिवसेना का संविधान?

पार्टी प्रमुख द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य को हटाने का अधिकार 'पार्टी प्रमुख' के पास होता है। इसलिए, उद्धव ठाकरे को पार्टी प्रमुख के रूप में चुनाव रद्द करने का पूरा अधिकार है। इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने शिंदे और गवली के खिलाफ कार्रवाई की है। शिवसेना के संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि एकनाथ शिंदे शिवसेना और धनुष तीर के 40 विधायकों और 13 सांसदों की ताकत का दावा नहीं कर सकते।

शिंदे को कम से कम 250 प्रतिनिधि सदस्यों वाली पार्टी से चुना जाना है। इसके बाद ही उन्हें चुनाव आयोग की मंजूरी मिलेगी और वे शिवसेना पर दावा कर सकते हैं। हालांकि, शिवसेना प्रमुख का फैसला अंतिम होता है, इसलिए बागियों के लिए आगे कठिन समय हो सकता है।

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