कैसे एक सन्यासी बना भारत का युवा आदर्श

युवाओं को आदर्श स्थापित करने के लिए किसी बड़े काम करने की जरुरत नहीं केवल आदर्श सोच रखने की जरुरत है.
शिकागो धर्म सम्मेलन

शिकागो धर्म सम्मेलन

जब किसी युवा को एक आदर्श मिल जाए तो वह एक दूरगामी आदर्श स्थापित करता है. जिस तरह देश के प्रेरक युवा स्वामी विवेकानंद को उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का साथ मिला. उसी तरह देश का हर युवा अपनी सत्यकर्म से दूरगामी परिणाम देश के लिए दे. स्वामी विवेकानंद विश्व के युवाओं के प्रेरक युग को देखने वाले सन्यासी थे. उन्होने अपने युग को पहचानते हुए युवाओं को हर दिन कुछ नया करने और जगाने का कठिन किया. कठोपनिषद के मंत्र ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ को अपना ध्येय वाक्य बनाते हुए उन्होने युवाओं से आह्वान किया कि ’उठो जागो और स्वयं जागकर औरों को जगाओ और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए’.

युवा शक्ति और साहस का पुंज हैं – स्वामी विवेकानंद

उनकी इस बात में अर्थ था कि युवा अंधकार से बाहर निकलकर युवा ज्ञान की और बढ़े. समाज में फैले तमाम अंधविश्वासों और घृणित कुरीतियों से मुक्ति होने के साथ ऐसे बंधनों से मुक्त होने का आह्वान किया. जिनसे मन अकर्मण्य होकर गलत बातों की और ना बढ़े.

उनका मानना था कि युवा शक्ति और साहस का पुंज है युवा यदि कुछ करने की ठान ले तो वो राष्ट्र को सर्वोत्कृष्टता कि और लेकर जा सकता है. स्वामी जी ने लिखा है ‘मुझे बहुत से ऐसे युवा

सन्यासी चाहिए जो गांवों जाकर देशवासियों की सेवा में कार्य करें. मैं यह भी मानता हूं उन्हे शास्त्रों, पुराणों और वेदों का भाव समझकर उसे मन में बसाना चाहिए. जिससे वे जीवन के प्रति सकारात्मक भाव रखते हुए युवा शीर्ष पर पहुंच सकें.

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जयपुर में स्वामी विवेकानंद केंद्र पर विवेक सम्मान समारोह का आयोजन

ओजस्वी उद्बोधन से सभी धर्मावलंबी थे प्रभावित -

स्वामी विवेकानंद ने मात्र 30 साल की उम्र में शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन उन्हे बोलने के लिए सभा में केवल 2 मिनट का समय दिया गया. किंतु उनके ओजस्वी उद्बोधन के बाद लोगों की मांग पर धर्म महासभा महासभा के हर सत्र में वह अपने प्रभावी उद्बोधन में छाए रहे. उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं उस देश का वासी हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों से सताए लोगों को अपने यहां शरण दी.

गीता के उपदेश से जुडे वाक्य के अनुसार जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसे भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं, लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंच ही जाते हैं. आप ये जानते होंगे की वह धर्म सभा के लिए 6 सप्ताह पहले ही शिकागो पहुंच तो गए थे, लेकिन उनके पैसे खत्म हो गए थे. कड़ाके की ठंड में बिना गर्म कपड़ों और प्रवेश के लिए सही पत्र होने के बाद भी उन्होंने अपना धीरज नहीं खायो और भारत का प्रतिनिधित्व किया.

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राजस्थान में मिला उन्हे विवेकानंद नाम -

स्वामी विवेकानंद का राजस्थान से गहरा नाता है. विवेकानंद नाम उन्हें राजस्थान में ही मिला. उनकी जीवनी के लिखे लेख के अनुसार शिकागो जाने से पहले खेतड़ी के राजा अजीत सिंह उन्हें माउंट आबू से ससम्मान अपने यहां लेकर आए थे. इससे पहले उन्हें नरेंद्रनाथ दत्त और विविदिशानंद नाम से जाना जाता था. राजा अजीत सिंह ने उनकी ऊर्जा, अध्यात्म और दर्शन के अद्भुत ज्ञान के कारण सबसे पहले विवेकानंद नाम से संबोधित किया. वही राजा अजीत सिंह से भेंट के रुप में राजस्थानी भगवा साफा, चोगा, कमरबंद दिया. जिन्हे पहने हुए वह विश्व धर्म सम्मेलन के लिए शिकागो गए.

गीता पढ़ने के बजाए फुटबाल खेले युवा – स्वामी विवेकानंद

कभी भगवद्गीता को जीवन का मूल मंत्र मानने वाले स्वामी विवेकानंद ने कभी यह कहा था कि युवाओं को गीता पढ़ने की बजाय फुटबॉल खेलना चाहिए. उनका मानना था कि युवाओं का स्नायु तंत्र मजबूत होना चाहिए. जिससे उनका मन शांत रहेगा. वहीं उन्होने युवाओं को एक लक्ष्य पर रहते हुए कहा की धर्म मनुष्य की अंतर्मेधा साधने की कला है. इसके द्वारा हम मन को अनुशासन में बांधते हैं.

सकारात्मक सोच से हर कार्य संभव -

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो आप विवेकानंद को पढ़िए. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक पाएंगे. यह भी मानना है कि सभी सकारात्मक सोच रखते हुए काम करेंगे तो तो कोई भी ऐसा काम नहीं है. जिसमें आप सफल ना हो सके. हम स्वामी विवेकानंद जयंती को युवा दिवस के रूप में इसलिए मनाते है. सफल सोच के वे अद्भुत युवा सन्यासी युवांओ की सबसे बड़ी प्रेरणा थे. वे कैसी भी और किसी भी परिस्तिथि में अपने धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं हो सकता. मैं उन्हे जीतनी बार भी पढता हूं. उतनी बार मुझे कुछ नया सीखने को मिलता है.

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