पिछले 7 सालों में 122 छात्रों ने की खुदकुशी, क्या केंद्र के उच्च कोटी के शिक्षण संस्थान बन गए है जातिगत भेदभाव का गढ़ ?

पिछले 7 सालों की अगर बात की जाए तो देश के केंद्रीय विश्व विद्यालयों में खुदकुशी के 122 मामले सामने आए है. क्या आईआईटी, आईआईएम और सेंट्रल यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव बड़ा मसला बन गया है?
पिछले 7 सालों में 122 छात्रों ने की खुदकुशी, क्या केंद्र के उच्च कोटी के शिक्षण संस्थान बन गए है जातिगत भेदभाव का गढ़ ?

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इस पूरे समय में मेरे जैसे लोगों के लिए जीवन अभिशाप ही रहा. मेरा जन्म एक भयंकर हादसा था.

लोग मुझे कायर क़रार देंगे. स्वार्थी भी, मूर्ख भी. जब मैं चला जाऊंगा. मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता लोग मुझे क्या कहेंगे.

ये लाइन रोहित वेमुला के सुसाइड नोट से ली गई है. वह सुसाइड नोट इंग्लिश में था ये लाइन उनका हिंदी अनुवाद है.

हाल ही में इसी सप्ताह में सोमवार को केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि देश के IIT, IIM, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और भारत सरकार के फंड से चलने वाले दूसरे हायर एज्युकेशनल इंस्टिट्यूशनल में पिछले 7 सालों में यानी साल 2014 से 2021 के बीच इन संस्थानों में 122 छात्रों ने खुदकुशी कर ली.

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इन आकंड़ों के सामने आने के बाद कई सवाल उठने लगे है. क्या केंद्र की संस्थान जातिगत आधार पर चल रहे है?, क्या देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में SC,ST,OBC और माइनॉरिटी कॉस्ट के साथ ताथकथित स्टूडेंट द्वारा भेदभाव करने के कारण इन बच्चों ने खुदखुशी की.

वहीं लोकसभा सासंद एकेपी चिनराज के एक सवाल पर केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद प्रधान ने लोकसभा में बताया की खुदकुशी करने वाले छात्रो में 24 बच्चे SC, 3 बच्चे ST,41 बच्चे OBC और 3 माइनॉरिटी कॉस्ट के थे.

वही केंद्र सरकार पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक़ IIT,IIM, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस, सेंट्रल यूनिवर्सिटी और बाकी एज्युकेशनल इंस्टिट्यूशनल में इस बीच खुदकुशी के 121 मामले रिपोर्ट हुए.

<div class="paragraphs"><p>Union Education Minister Dharmendra Pradhan</p></div>

Union Education Minister Dharmendra Pradhan

किसी के साथ जातिगत भेदभाव करना सबसे बड़ा अपराध है. क्योकी व्यक्ति का परिचय उसकी जाति से नहीं उसके कर्मों से होता है. जातिगत भेदभाव व्यक्ति को पतन की और लेकर जाता है.

खुदकुशी एक गंभीर साइकोलॉजी और सोशल प्रॉब्लम है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो आप नीचे दिए गए नंबर पर कॉल करके अपनी परेशानी सरकार द्वारा विशेषज्ञों के साथ बात करें और आप इस मामले में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात कर सकते है.

<div class="paragraphs"><p>Helpline numbers issued by the central government</p></div>

Helpline numbers issued by the central government

सबसे बड़ा सवाल की जितने भी छात्रों की इन 7 सालों में मौत हुई उनमें 58 प्रतिशत छात्र SC,ST,OBC और माइनॉरिटी कॉस्ट से ताल्लुक रखते है. खुदकुशी में करने वाले छात्रों में इतनी बड़ी संख्या केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की है.

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लोकसभा में धर्मेंद्र प्रधान का बयान -

छात्रों के साथ आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर लोकसभा में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद प्रधान ने बताया,” सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने छात्रों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न के मामलों की रोकथाम के लिए कई कदम उठाए है. छात्रों के हितों की रक्षा करने के लिए यूजीसी ने स्टूडेंट की शिकायतों के निवारण के लिए नियम, 2019 का प्रवाधान किया है. इसके अलावा मंत्रालय ने भी इस दिशा में कई कदम बढ़ाए है. बच्चों पर पढ़ाई का प्रेशर कम हो इसके लिए उनकी क्षेत्रीय भाषा में तकनीकी शिक्षा देना भी शुरू किया है. जिससे उनकी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जा सके.

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सरकारी आंकड़ों की माने तो, खुदकुशी करन वाले स्टूडेंट में 34 छात्र आईआईटी, 5 आईआईएम के, 9 बच्चे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस,बेंगलुरू और IISER के थे. जबकी 4 छात्र IIT में पढ़ते थे.

पिछले 7 सालों में देश के अलग-अलग केंद्रीय विश्व विद्यालय में 37 बच्चों ने सुसाइड किया, तो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के अलग-अलग कैंपस में 300 बच्चों की मौत खुदकुशी के कारण हुई।

सरकार की कोशिश लगातार जारी -

सरकार और यूजीसी की हर संभव कोशिश जारी है की विश्वविद्यालयो में बच्चे आत्महत्या नहीं करें. इसके लिए भारत सरकार ने मनोदर्पण नाम से एक पहल शुरू की है. इसके जरिए छात्रों, शिक्षकों और परिजनों को कोरोना महामारी और उसके बाद के हालात में मनोवैज्ञानिक मदद करवाई जा सके. इसके अलावा संस्थानों में हैप्पी और स्वस्थ्य जीवनशैली पर वर्कशॉप और सेमीनार के आयोजन किए जा रहे है. योग के सेशन भी किए जा रहे है और खेल-कूद, सांस्कृतिक और अन्य गतिविधियों का भी आयोजन किया जा रहा है. लेकिन क्या सरकार इस पर कई ध्यान दे रहा है? क्या सरकार बनाए गए नियमों की मानिटरिंग क्यों नहीं कर रही है? चलिए जानते है क्या वजह है छात्रों के खुदकुशी करने की.

<div class="paragraphs"><p>photo of student protesting</p></div>

photo of student protesting

बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस -

साल 2021 मार्च के बाद संस्थान में खुदकुशी करने वाले चार छात्रों में से तीन ने अपने हॉस्टल के रुम में पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी. इसके चलते बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस के हॉस्टल के कमरों से सीलिंग फैन हटाए जा रहे है. न्यूज वेबसाइट ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के अनुसार संस्थान सीलिंग फैन हटाकर दीवारों पर वॉल फैन या फिर टेबल फैल लगाने की योजना पर कार्य कर रही है.

न्यूज वेबसाइट ‘द प्रिंट’ रिपोर्ट में कहा गया है की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस के अधिकारियों ने ईमेल पर भेजे गए अपने जवाब में जानकादी दी कि हेल्थ एक्पर्ट की सिफारिश के बाद ही वे सीलिंग फैन हटा रहे है. इसके अलावा संस्थान के काउंसिलर भी स्टूडेंट से उनके तबीयत के बारे में पूछ रहे है.

हालांकि बुद्धिजीवियों और सीनियर छात्र नेताओं का कहना है की विद्यार्थी के खुदकुशी करने के मामले इन कदमों से खत्न नहीं होने जा रह है.

“सरकार ने जो आकंड़े मुहैया कराए हैं वे केवल उन स्टूडेंट के हैं, जिन्होंने कैंपस के भीतर खुदकुशी की. घर या कैंपस के बाहर कहीं और खुदकुशी करने वालों छात्रों की संख्या इन आंकड़ों में शामिल नहीं है.” ये बात हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पूर्व रिसर्च स्कॉलर और द्रविड़ बहुजन वेदिका के संस्थापक अध्यक्ष ड़ॉक्टर जिलुकारा श्रीनिवास ने कहीं है.

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क्या केंद्र के विश्व विद्यालय पर अगड़ी जातियों का नियंत्रण है ये कैसे निश्चत हो ? –

देश में कहीं भी किसी भी विद्यार्थी के खुदकुशी की बात आती है. तो इल्जाम लगता है अगड़ी जातियों या कहें उच्च जातियों पर आखिर क्यों ? लोकसभा में हाल ही में सरकार द्वारा दिए आंकड़ों पर गौर करें तो उसमें ज़्यादातर एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र थे.केवल इस बात पर ये कहना की वहां उच्च जाति का नियंत्रण है. ये कहना गलत होगा.

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Rohit Vemula

इस मामले पर हमने जब एबीवीपी राजस्थान के प्रदेश महामंत्री होशियार मीणा से बात की तो उन्होने कहा ‘देश और दुनिया का आधुनिकरण हो रहा है और युवा उसकी और भाग रहा है. इस आधुनिकरण में युवाओं को शांति नहीं मिल पा रही है. छात्र घर वालों से दूर रहते है. इस कारण रोजगार, पढ़ाई का प्रेशर और परिवार की जिम्मेदारी का प्रेशर उन पर रहता है. इस कारण आज का युवा मानसिक तनाव से जूझ रहा है साथ ही देश में कुछ लोग विश्व में देश का नाम खराब करने के लिए प्रोपेगेंडा चला रहे है. कोरोना के बाद देश का युवा ज्यादा परेशान और मानसिक तनाव में है लेकिन देश के बड़े इंस्टिट्यूट में कोई भी जातिगत भेदभाव नहीं होता है.

अगर देश में युवा मानसिक तनाव में चल रहा है तो केंद्र सरकार को इस और ध्यान देना चाहिए. युवाओं के मनोरजंन के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करवाना चाहिए. जिससे उनक पर मानसिक तनाव हावी ना हो. “

गैरबराबरी तो कम हुई लेकिन अभी सुधार की और आवश्कता –

वैसे तो कैंपसों में लड़के-लड़कियों के बीच गैरबराबरी कम जरुर हुई है लेकिन जातिगत भेदभाव के मामलों में अभी तक सुधार नहीं आया है. SC, ST, OBC और माइनॉरिटी कॉस्ट से ताल्लुक रखने वाले स्टूडेंट के प्रति संवेदनशील रवैया रखने को लेकर लोगों में अभी भी समझ नहीं आई है.

वैसे तो सरकार की तरफ से इन मामलों के सामने आने के बाद शिकायत निवारण प्रकोष्ठ गठित की गई है. छात्रों के लिए काउंसलर भी रखे गए है लेकिन बहुत से कैंपस परिसर में अभी भी ऐसा किया जाना अभी बाकी है लेकिन जहां ये विभाग काम कर रहे है. वहां छात्रों को कोई खास मदद नहीं मिल पा रही है.

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रोहित वेमुला का मामला आपको याद है 2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में छात्र रोहित ने खुदकुशी कर ली थी तो सिविल सोसायटी ने ये माना था कि ये खुदकुशी नहीं बल्कि सिस्टम के द्वारा की गई एक हत्या है.

सेंथिल कुमार और रोहित वेमुला जैसे छात्र और भी हैं देश में -

सेंथिल कुमार और रोहित वेमुला का मामला आप सभी को याद है.,"साल 2008 में पीएचडी स्टूडेंट रहे छात्र सेंथिल कुमार ने भी इन्हीं परिस्थितियों में आत्महत्या की थी. वे तमिलनाडु से थे और ST से ताल्लुक रखते थे. जब सेंथिल फेलोशिप लेने गए तो उनसे कहा गया था कि तुम सुअर चराने वाले हो, तुम्हें एज्युकेशन की क्या जरुरत. इससे वो विचलित हुए. वहीं स्कॉलरशिप का पैसा मिलने में देरी के कारण वह कर्ज में डूबे. उनके परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनकी मदद कर सकें. उन्हें कोई रास्ता नहीं मिला और उसने खुदकुशी कर ली."

ठीक इसी तरह रोहित वेमुला को भी सामाजिक और राजनीतिक भेदभाव का सामना करना पड़ा था जिसकी वजह से उन्होंने साल 2016 में आत्महत्या की. रोहित ने लगातार कैंपस में भेदभाव और ग़ैरबराबरी का राजनीतिक तौर पर विरोध भी किया. इस पर वे कैंपस से सस्पेंड भी हुए और इसके खिलाफ उन्होने संघर्ष भी किया. जब उन्हें लगा कि वे इस नाइंसाफ़ी से नहीं लड़ पाएंगे तो उन्होंने खुदकुशी कर ली."

<div class="paragraphs"><p>Student Genaram Dewasi's photo</p></div>

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वहीं राजस्थान के जोधपुर में डॉक्टर एसएन मेडिकल कॉलेज में एक छात्र जालौर जिले के रामसीन में रहने वाला गेनाराम देवासी ने फंदा लाकर आत्महत्या कर ली.छात्र एमबीबीएस फाइनल ईयर का स्टूडेंट था. सुसाइड के बाद पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला है जिसमें लिखा है कि मैं पिछले 2 महीने से बहुत परेशान हूं. अब मैं और नहीं जी सकता.

साइकोलॉजी डॉक्टर जयश्री क्टर जयश्री जैन क्या कहती है इस पर –

<div class="paragraphs"><p>mental stress</p></div>

mental stress

छात्रों में खुदकुशी करना कोई नई बात नहीं रही. 21वी सदी में मानसिक तनाव स्टूडेंट में अंदर तक उतर चुका है. जॉब की टेंशन और सोसाइटी में सबका फैवरेट बनने की होड़ उनमें मानसिक तनाव को और बढ़ाती है. वह ये सोचता है की अगर वह सबका फेवरेट नहीं बन पाएगा तो लोग उसे अपना नहीं बनाएंगे. इसके कारण वह गिल्ट और दुख में चला जाता है और ये ही लक्षण उसे खुदकुशी करने के प्रमुख कारण बनते है.

आखिर स्टूडेंट तनाव में हैं यह कैसे पता लगाया जाए. इस पर डॉक्टर जयश्री का कहना है की उसमें खुशी का अभाव कम होता है दुख की भावनाएं उसके मन में आने लगती है. पहले जो चीज उसे खुशी देती थी वह अब उसे खुशी नहीं दे रही है. भविष्य के प्रति उसमें निराशा आने लगती है. शरीर में पहले की तरह ऊर्जावान नहीं रहता. वह शारीरिक रुप से तो मजबूत दिखता है लेकिन मानसिक रुप से वह काफी कमजोर होता है. यह कुछ कारण है जिससे वह तनाव में दिखाई देता है.

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