विपक्ष नहीं, खुद कांग्रेसी नेता ही डुबा रहे कांग्रेस की लुटिया!! जानिए कैसे ?

कांग्रेस हाईकमान ने राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन करने की जो रणनीति अपनाई वह बताती है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ऐतिहासिक गलतियों के बाद भी न तो सुधरना चाहता है और ना ही भाजपा की कार्यशैली से सबक लेना चाहता है।
विपक्ष नहीं, खुद कांग्रेसी नेता ही डुबा रहे कांग्रेस की लुटिया!! जानिए कैसे ?

राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा कर रहे हैं और इधर राजस्थान में कांग्रेस टूटने के कगार पर पहुंच गई है। हद ये हो गई है कि राजस्थान कांग्रेस के विधायकों ने कांग्रेस में अनुशासन और चरित्र के चीथड़े उड़ा दिए हैं।

कांग्रेस हाईकमान ने राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन करने की जो रणनीति अपनाई वह बताती है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ऐतिहासिक गलतियों के बाद भी न तो सुधरना चाहता है और ना ही भाजपा की कार्यशैली से सबक लेना चाहता है।

सत्ता के लिए मार काट पर उतरी कांग्रेस
भाजपा में सत्ता का ट्रांस्फर जिस सहजता, स्वीकार्यता और सभी की सहभागिता के साथ होता हैं वह कांग्रेस के संस्कारों में कभी नहीं रहा। एक दल के रूप में दयनीय हालत में पहुंचने के बाद भी सत्ता के लिए आपस में मार काट पर उतर आना, पार्टी से बगावत करना और राजनीतिक दुर्दशा के बाद भी कांग्रेस का रत्तीभर न सुधरना बताता हैं कि कांग्रेस को मिट्टी में मिलाने की तैयारी विपक्ष नहीं, कांग्रेस के नेता खुद कर रहे हैं।

कांग्रेस को भाजपा से लेना चाहिए सबक, कैसे होता है सत्ता का ट्रांसफर ?

अब एक उदाहरण उत्तराखंड का ले लीजिए कि बीजेपी ने त्रिवेन्द्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया और फिर पुश्कर धामी को। धामी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में तो आई लेकिन खुद चुनाव हार गए ।

भाजपा ने फिर से हारे हुए विधायक धामी को मुख्यमंत्री बना दिया। उत्तराखण्ड में भाजपा के छह पूर्व मुख्यमंत्री में से एक ने एक बार भी भाजपा हाईकमान से नहीं पूछा कि हारे हुए नेता को मुख्यमंत्री क्यों बनाया जा रहा है?

भाजपा अध्यक्ष के साथ पुष्कर सिंह धामी
भाजपा अध्यक्ष के साथ पुष्कर सिंह धामी

गुजरात में आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया, बाद में आनंदीबेन पटेल की जगह विजय रूपानी मुख्यमंत्री बने। पिछले साल सितंबर में, भाजपा ने विजय रूपानी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के साथ पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया। हटाए गए मुख्यमंत्री विजय रुपानी और उनकी पूरी कैबिनेट के मुंह से आवाज तक नहीं निकली।

इसी तरह कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलते हुए भाजपा ने लिंगायत समुदाय से आने वाले भाजपा के बड़े नेता बी एस येदियुरप्पा की जगह एक अन्य लिंगायत नेता बसवराज एस बोम्मई को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बना दिया जो कांग्रेस से भाजपा में आये थे। लेकिन कर्नाटक भाजपा में कहीं बगावत के सुर सुनाई नहीं दिये।

अभी तीन महीने पहले महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंन्द्र फड़नवीस को उपमुख्यमंत्री बना दिया। फड़नवीस ने नहीं कहा कि 105 विधायक होने के बाद भी मुझे मुख्यमंत्री क्यो नहीं बनाया और 45 विधायकों के समर्थन वाले एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया?

अनुशासित पार्टी कार्यकर्ता की तरह देवेन्द्र फड़नवीस ने चुपचाप उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और काम पर लग गए।

किसी को कानों कान खबर नहीं कि क्या होने जा रहा है। मीडिया को भनक तक नहीं। कोई विद्रोह, विरोध और बगावत नहीं।

कांग्रेस में हावी है आंतरिक गुटबाजी

लेकिन कांग्रेस को देखें तो राहुल गांधी उनकी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी एक साथ राजनीति में सक्रिय हैं, उसके बाद भी पार्टी पर गांधी परिवार की पकड़ बहुत कमजोर दिखती है।

आंतरिक गुटबाजी के आगे ये तीनों बेबस दिखते हैं। इसका परिणाम है कि देशभर में कांग्रेस आज जितनी कमजोर है, इससे ज्यादा कमजोर पहले कभी नही थी। यह पारिवारिक तिकड़ी पार्टी में पकड़ और जनता में असर को लगातार खोती जा रही है।

लेकिन आश्चर्य है कि कांग्रेस की लगातार होती भौगोलिक सिकुड़न के बीच सोनिया और राहुल कुछ ऐसा नहीं कर पा रहे हैं कि कांग्रेस अपने भीतर गुटबाजी को कम कर सके।

भारत के 30 राज्यों में से कांग्रेस केवल दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता में है। दो अन्य राज्यों बिहार और झारखण्ड में सत्तारूढ़ गठबंधनों में जूनियर पार्टनर हैं। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पुडुच्चेरी में अपने ही नेताओं के पाला बदलने के कारण अपनी सरकारें गिरती देखा हैं।

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा की सरकार बनवा दी और खुद केन्द्र में मंत्री बन गए। मध्य प्रदेश और कर्नाटक की सरकार गिरी तो गांधी परिवार मूक दर्शक बना रहा।

पायलट और गहलोत के बीच खुला युद्ध

राजस्थान में सचिन पायलट का अशोक गहलोत से खुला युद्ध राजस्थान में सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लाचार होकर देखता रहा और उसका कोई हल नहीं निकाल सका। इस लाचारी का परिणाम आज सबके सामने हैं।

पंजाब में सत्ता का संघर्ष, अमरिंदर की बगावत और पंजाब में सत्ता गंवाना ज्यादा पुराना किस्सा नहीं है। पार्टी तेलंगाना, मणिपुर और गोवा में, जहां वह सत्ता में नहीं है, बड़े पैमाने पर दलबदल की गवाह बनी हैं और पार्टी के विधायक भाजपा और दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। कांग्रेस हाईकमान ने उन्हे रोकने और वापस पार्टी में लाने को लेकर कोई पहल नहीं की।

कांग्रेस का स्वस्थ होना देश के स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। लेकिन स्वस्थ होने के लिए कांग्रेस को अपनी काया में अंदर तक समा गए भ्रष्टाचार और वंशवाद से मुक्ति पाना होगा।

एक परिवार की बजाय जिस दिन कांग्रेस अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की पार्टी बन जाएगी उस दिन यह कांग्रेस, पहले वाले संस्करण की तुलना में काफी संशोधित, परिवर्तित एवं रूपांतरित पार्टी के रूप में सामने होगी।

लेकिन फिलहाल ऐसी कांग्रेस बन सके इसकी संभावना बेहद कम दिखाई देती है।

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