Teachers Day Special: इनोवेटिव टीचर...गांव देहात में कायाकल्प; ऐप, कोडिंग के जरिये शिक्षा की इबादत

शिक्षक दिवस पर ऐसे पांच शिक्षकों की कहानी के बारे में जानें जिन्होंने अपने अपने इनोवेटिव आइडियाज से कुछ ऐसा नया किया जिससे बच्चों का भविष्य तो संवारा ही, साथ ही वे दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
Teachers Day Special: इनोवेटिव टीचर...गांव देहात में कायाकल्प; ऐप, कोडिंग के जरिये शिक्षा की इबादत

5 सितंबर, अर्थात आज शिक्षक दिवस है। आज हम पांच ऐसे शिक्षकों की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने कुछ नया करने की ढानी और अपने इनोवेटिव आइडियाज से कुछ ऐसा कर डाला जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए। इन टीचरों ने गांव देहात में रहकर वहां के सरकारी स्कूलों को ऐसा कायाकल्प किया कि अब वहां एडमिशन के लिए वेटिंग रहती है। जाने इनकी दिलचस्प कहानी के बारे में...

पहली स्टोरी

हर घर में चलता-फिरता स्कूल, बच्चे पढ़ाते हैं मां-बाप को

पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले का एक ट्राइबल गांव है जोबा अटपारा । ज्यादातर लोग गरीब हैं। यहां अधिकतर घर मिट्टी के हैं, लेकिन उनकी दीवारों पर खूबसूरत और क्रिएटिव ब्लैकबोर्ड बने हुए हैं, जिन पर पेंटिंग के जरिए फलों के नाम, गिनती, वर्णमाला उकेरे गए हैं। बच्चे बंगाली, हिंदी के साथ अंग्रेजी भी बोलने का प्रयास करते हैं। यहां घरों का नजारा अलग ही है, कोई बच्चा खुद के साथ साथ अपने माता-पिता को पढ़ाता दिख जाएगा, तो कोई आपने भाई-बहनों को अंग्रेजी की सिखाता। वहीं कोई दीवारों पर बने ब्लैकबोर्ड पर गणित की पहेली सुलझा नजर आ जाएगा।

यह नतीजा है आसनसोल के रहने वाले शिक्षक दीप नारायण नायक के प्रयासों का। दीवारों पर बने ब्लैकबोर्ड की तस्वीर को 2021 में UNICEF ने फोटो ऑफ द ईयर कंटेस्ट में सेकेंड प्राइज दिया था।

चुनावों की वॉल पेंटिंग देखकर मिला आइडिया

35 साल के शिक्षक दीप नारायण बताते हैं कि जब कोविड के चलते लॉकडाउन लगा, तो बच्चों की पढ़ाई ठप हो गई। न घर में उन्हें कोई पढ़ाने वाला था, न ही उनके पास पढ़ाई के लिए कोई साधन उपलब्ध था। वे दिनभर इधर-उधर भटकते रहते थे। अप्रैल 2020 में मैंने दो बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाना शुरू किया, लेकिन उनके घर वाले विरोध करने लगे कि बच्चा पढ़ेगा तो मजदूरी कौन करेगा। बहुत समझाने के बाद वे लोग माने। इस तरह धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।

एक दिन एक बच्चे को किसी कीड़े ने काट दिया। बच्चा काफी देर तक रोता रहा। उसके बाद मेरे मन में यह ख्याल आने लगा कि यदि कल को इन बच्चों में से किसी को सांप डस ले तो... फिर मेरे दिमाग में आइडिया आया कि जैसे चुनावों में वॉल पेंटिंग की जाती है, उसी तरह घरों की दीवारों पर पेंटिंग के जरिए ब्लैकबोर्ड बनाया जा सकता है।

12 गांवों में घरों की दीवारों पर बना दिए ब्लैकबोर्ड

शिक्षक दीप नारायण ने पहले एक घर की दीवारों पर पेंट से ब्लैकबोर्ड बनाए। उसके ऊपर वर्णमाला, गिनती जैसी जरूरी चीजें उकेर दीं और बच्चों को पढ़ाने लगे। इससे बच्चों की पढ़ाई में दिलचस्पी बढ़ने लगी। देखते ही देखते कुछ ही महीनों में एक दर्जन से ज्यादा गांवों में घरों की दीवारों पर ब्लैकबोर्ड बन गए।

अब भले ही स्कूल खुल गए हैं, लेकिन यह मुहिम जारी है। स्कूल से आने के बाद बच्चे इन घरों की दीवारों पर बने ब्लैकबोर्ड के जरिए पढ़ाई करते हैं। साथ में अपने माता-पिता को भी पढ़ाते हैं। उनके लिए अब वक्त की पाबंदी भी नहीं है। रात में भी वे लालटेन जलाकर ब्लैकबोर्ड पर प्रैक्टिस करते हैं। करीब 2 हजार बच्चों और उनके माता-पिता को इस मुहिम का फायदा मिल रहा है।

दूसरी स्टोरी

स्टूडेंट्स सिखा रहे हैं 40 देशों के बच्चों को कोडिंग

महाराष्ट्र के सतारा जिले के विजयनगर में स्थित जिला परिषद प्राइमरी स्कूल। ईंट भट्ठा और चरवाहों की बस्ती में बना ये स्कूल दुनिया के 40 देशों से जुड़ा है। जापान, अमेरिका, लंदन, जर्मनी, न्यूजीलैंड जैसे देशों के स्कूली बच्चे इससे हुनर सीख रहे हैं। यहां के बच्चे कंप्यूटर पर कोडिंग करते हैं, ऐप बनाते हैं, ऑनलाइन ग्रुप स्टडी करते हैं। इतना ही नहीं, खेलने-कूदने की उम्र में ये बच्चे होममेड साबुन और हर्बल प्रोडक्ट भी बना रहे हैं और अलग-अलग जगहों पर एग्जीबिशन लगाकर उसकी मार्केटिंग भी करते हैं।

इन सब के पीछे मेहनत है 36 साल के शिक्षक बालाजी बाबूराव जाधव की। इसके लिए उन्हें नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर 70 से ज्यादा अवॉर्ड मिले हैं। यह स्कूल तो स्मार्ट है ही, यहां पढ़ने वाले बच्चे उससे भी स्मार्ट हैं। पलक झपकते टैब पर मुश्किल से मुश्किल सवालों के जवाब ढूंढ लेते हैं।

पहले थे मजदूरों के बच्चे, अब अमीरों के बच्चे भी वेटिंग लिस्ट में

शिक्षक बालाजी बाबूराव कहते हैं कि कुछ साल पहले यह स्कूल अछूत जैसा था। सिर्फ चरवाहों और ईंट भट्ठा पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे यहां पढ़ते थे। वे भी मिड डे मिल के लिए स्कूल आते थे। तब स्कूल में न तो टॉयलेट, न बिजली और न कोई कंप्यूटर। केवल दीवारों का ढांचा और जमीन पर दरी बिछाकर बच्चों की पढ़ाई होती थी। अब बड़े-बड़े लोग गुजारिश करते हैं कि हमारे बच्चे का एडमिशन ले लीजिए।

बालाजी बाबूराव कहते हैं कि 10 साल पहले की बात है। सतारा के पॉलिटेक्निक कॉलेज के एक कार्यक्रम में मुझे पहली बार ऑनलाइन एजुकेशन के बारे में पता लगा। तब मेरी खुद की ईमेल आईडी भी नहीं थी। बटन वाला फोन चलाता था। उसके बाद मैंने स्मार्टफोन खरीदा और गूगल पर एजुकेशन के बारे में सर्च करना शुरू किया। इंटरनेट से जुड़े अलग-अलग वर्कशॉप में जाने लगा। कुछ साल बाद मैं गूगल सर्टिफाइड टीचर बन गया।

फिर एक लैपटॉप खरीदा। इसके जरिए बच्चों को पढ़ाने लगा। उन्हें क्लास में जो टॉपिक पढ़ाता, लैपटॉप पर उसके वीडियो दिखाता था। इसके बाद मैंने कोडिंग सीखी, फिर बच्चों को सिखाई। अब मेरा फोकस स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने का था। मैंने CSR फंड के लिए अप्लाई किया। मेरे काम की वजह से जल्द ही ग्रांट मिल गया। इसके बाद स्कूल में कंप्यूटर लैब बनवाया, टैब लगवाए, ई-लाइब्रेरी डेवलप कराया। इसका असर ये हुआ कि हमारे बच्चे नेशनल लेवल पर अवॉर्ड जीतने लगे।

40 देशों के स्कूलों से टाइअप, शेयर करते हैं आइडिया

बालाजी बाबूराव कहते हैं कि हमारे प्रोजेक्ट से 40 देशों के स्कूल जुड़े हैं। हमारे बच्चे उन्हें अपना हुनर सिखाते हैं और वहां के बच्चे हमारे बच्चों को। इस तरह हम एक दूसरे से आइडिया और टेक्नोलॉजी शेयर करते हैं। इससे बच्चों की नॉलेज बढ़ती हैं। उन्हें पता चलता है कि भारत के बाहर के बड़े-बड़े देशों के बच्चे क्या और कैसे पढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं भारत के भी 25 से ज्यादा राज्यों में हमारे बच्चे दूसरे बच्चों को अपना हुनर सिखा रहे हैं।

तीसरी स्टोरी

पहले थे महज 19 बच्चे, आज एडमिशन के लिए 50 बच्चे वेटिंग में

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 200 किमी दूर बस्ती जिले का प्राइमरी स्कूल मूडघाट। हरा-भरा ग्राउंड, रंग-बिरंगी दीवारें और उन पर उकेरी गईं खूबसूरत पेंटिंग्स। बाउंड्री वॉल पर अटल जी पंक्तियां लिखी हैं- छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

स्कूल सरकारी है, लेकिन बच्चे प्रोजेक्टर से पढ़ते है और कम्प्यूटर चलाते हैं। यहां CCTV कैमरे लगे हैं। स्कूल की लाइब्रेरी भी हाईटेक है, किताबों के साथ ही इंटरनेट के जरिए पढ़ने की फैसिलिटी, यानी ई-लाइब्रेरी। एक नजर में तो लगता है कोई हाई-फाई स्कूल है। स्कूल में एडमिशन के लिए 50 से अधिक की वेटिंग है।

19 से 280 पहुंची स्टूडेंट्स की संख्या

6 साल पहले तक स्कूल दीवारें टूटी-फूटी थीं। न ढंग के क्लास रूम थे, न ही बोर्ड और न टॉयलेट। पढ़ाई के नाम पर गिनती के 19 बच्चे, लेकिन आज यह स्कूल मॉडल बन गया है। बच्चों की संख्या 280 पहुंच गई है। अब दाखिले के लिए भी जगह नहीं है।

इस बदलाव का यश जाता है स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. सर्वेष्‍ट मिश्र को। इस पहल के लिए डॉ. सर्वेष्‍ट को 2018 में राष्‍ट्रपति पुरस्‍कार मिल चुका है। तब वे ये सम्मान पाने वाले प्रदेश के एक मात्र टीचर थे। जिस स्कूल में 6 साल पहले ढंग के क्लासरूम नहीं थे। ज्यादातर बच्चे पढ़ने नहीं आते थे, वहां के बच्चे अब प्रोजेक्टर से पढ़ रहे हैं।

डॉ. सर्वेष्‍ट के अनुसार साल 2016 में जब इस स्कूल में पोस्टिंग हुई, तो स्कूल के हालात काफी खराब थे। लोग अपने बच्चों को यहां पढ़ने नहीं भेजते थे। तत्‍कालीन DM आशुतोष निरंजन ने इस स्‍कूल को मॉडल स्‍कूल बनाने का जिम्‍मा मुझे सौंपा गया। इसके बाद मैं अपने मिशन में जुट गया।

घर-घर जाकर लोगों से मिला और उनसे जाना कि आखिर वे बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेज रहे। अपनी सैलरी से स्कूल की मरम्मत कराना शुरू किया। दीवारों पर पेंटिंग कराई, टॉयलेट ठीक कराया। फिर घर-घर जाकर डोनेशन लिया। किसी ने फर्नीचर दिए तो किसी ने प्रोजेक्टर के पैसे। किसी ने टीवी और पंखे गिफ्ट किए। इस तरह धीरे-धीरे यह मॉडल स्कूल के रूप में तब्दील होता गया।

सर्वेष्‍ट के अनुसार अब दूसरे गांवों से भी बच्चे यहां एडमीशन के लिए आते हैं। अभी 50 बच्चों का एडमिशन वेटिंग लिस्ट में है। हम टीचर्स रेगुलर बच्चों की एक्टिविटीज को मॉनिटर करते हैं। इसके लिए हमने 9 CCTV कैमरे लगाए हैं। अटेंडेंस के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम है, ताकि पता चल सके कि बच्चे या टीचर वक्त पर आ रहे हैं कि नहीं।

चौथी स्टोरी

टीचर ने बच्चों को सिखाई को़डिंग, अब बच्चे खुद बना लेते हैं ऐप

दिल्ली और हरियाणा बॉर्डर पर बजघेड़ा के सरकारी सीनियर सेकेंड्री स्कूल में बच्चे स्मार्ट टीवी के जरिये स्मार्ट हो रहे हैं। हिंदी के टीचर 50 साल के मनोज कुमार ने बताया कि उन्होंने कैसे बच्चों को कोडिंग और कंप्यूटर से जोड़ा। दूसरी-तीसरी क्लास के बच्चों को भी पता है कि स्मार्ट टीवी कैसे ऑपरेट होती है। बच्चे खुद उसे ऑन करते और डेमो देते हैं।

मनोज कहते हैं कि साल 2001 में मैं जब इस प्रोफेशन में आया, तब सबसे पहली चुनौती जो मुझे मिली, वो थी मिड-डे मील्स। नियम के मुताबिक पहली से आठवीं तक हर बच्चे को दोपहर का खाना मिलना था। इस काम के लिए एक टीचर की ड्यूटी लगती थी, जो सब कुछ संभालता। सिर्फ क्वांटिटी तय करने में ही शिक्षक के दो घंटे चले जाते थे।

मिड-डे मील के लिए बनाया पहला ऐप

मनोज बताते हैं कि मैं अक्सर सोचता रहता था कि क्या किया जा सकता है। तब तक कंप्यूटर से मेरी जान-पहचान हो चुकी थी। मैंने देखा कि बच्चों को कोडिंग जल्दी समझ आती है। मैंने कॉन्सेप्ट बनाया और बच्चों को जोड़ा। फिर हम मिलकर काम करने लगे। कुछ ही महीनों में एक ऐप तैयार हो गया।

इसमें बच्चों की संख्या और रेसिपी का नाम डालने पर खुद बता देगा कि कौन सी सामग्री, कितनी मात्रा में चाहिए। हमने अपने स्कूल पर अप्लाई किया और फिर इसे हरियाणा शिक्षा विभाग के सामने रखा। ये साल 2016 की बात है। तब से लेकर अब तक यही मिड-डे मील हरियाणा के हरेक सरकारी स्कूल में इस्तेमाल हो रहा है।

मिड-डे मील ऐप बनाकर उसका अप्रूवल लेने के दौरान कई चुनौतियां आईं। मैं हिंदी टीचर हूं, तो कंप्यूटर लैब में जाने पर बाकी लोग टोकते। कइयों को गुस्सा आता कि सबजेक्ट के बगैर मैं लैब में क्यों चला आता हूं। थोड़ी टोकटाकी शुरू हुई, तो मैंने दूसरा रास्ता निकाला। स्कूल का टाइम खत्म होने के बाद लैब में रुकने लगा। बड़ी क्लास के बच्चे भी मेरे साथ रहते और हम काम करते रहे।

मनोज के अनुसार स्कूल के कई बच्चे कोडिंग भी कर लेते हैं और मोबाइल ऐप भी बना लेते हैं। 2020 में ऐसी ही इनोवेशन के चलते मनोज को नेशनल टीचर अवॉर्ड मिला। उनके स्कूल के बच्चे हेलमेट में फैन और GPS भी डेवलप कर चुके हैं।

पांचवीं स्टोरी

खूबियों से भरा विश्व का सबसे लंबा स्याही वाला पेन बनाया

हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के सरकारी उच्च विद्यालय नौरंगाबाद में 20 फीट लंबा, एक फीट मोटा और 43 किलो वजनी स्याही वाला पेन स्थापित किया गया। स्कूल शिक्षक डॉ. संजीव अत्री ने शिक्षकों के सहयोग से इस पेन का डिजाइन बनवाया जिस पर 45 हजार रुपए की लागत आई है।

तीन माह की मेहनत में तैयार इस पेन को शक्ति नाम दिया गया है। पेन बनाने वाले शिक्षक डॉ. अत्री का दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा पेन है, जो लिखेगा ही नहीं, बल्कि किसी भी शिक्षक के छुट्टी पर होने पर उनकी ओर से रिकॉर्ड लेक्चर विद्यार्थियों को सुनाएगा भी। शिक्षण-अधिगम तकनीक से युक्त यह पेन दिन को विद्यार्थियों की निगरानी और रात को स्कूल की पहरेदारी करेगा।

लोहे और लकड़ी से पेन तैयार करने में जो खर्च आया, उसे सभी शिक्षकों ने वहन किया। इसमें लगे सेंसर हर तरह की कमांड संभालेंगे। इस पेन के बारे में लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड को भी सूचित किया गया है। इससे पहले वर्ल्ड रिकॉर्ड में 18 फीट लंबा बॉल पेन दर्ज है।

प्रार्थना सभा करवाएगा, गीत-कहानी सुनाएगा

शिक्षक अत्री ने बताया कि इसमें एक समय में दो लीटर स्याही डाली जा सकती है। इसमें सोलर सिस्टम भी स्थापित किया जाएगा, जो रात को रोशनी बिखेरेगा। ये पेन लिख सकता है। शारीरिक शिक्षक की गैर मौजूदगी में बच्चों को प्रार्थना सभा करवा सकता है। किसी शिक्षक के छुट्टी पर जाने पर उनकी आवाज में पाठ पढ़ा सकेगा। इसके लिए एक दिन पहले उस शिक्षक को अपना पाठ पेन में रिकॉर्ड करना होगा।

स्कूल परिसर में स्थापित यह पेन गीत, कहानी जैसी हर चीज बच्चों को सुना सकता है। इसका नियंत्रण मुख्याध्यापक कार्यालय में रहेगा। स्कूल परिसर की हर गतिविधि भी पेन में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद होगी। पेन जो पढ़ाई करवाएगा, उसकी सारी रिपोर्टिंग नियंत्रण कक्ष को भी भेजेगा।

जाने कौन हैं डॉ. राधाकृष्णन, जिनकी याद में मनाया जाता है शिक्षक दिवस

भारत हर साल डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को उनके योगदान और उपलब्धियों को श्रद्धांजलि के रूप में राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 5 सितंबर, 1888 को जन्मे डॉ. राधाकृष्णन ने न केवल भारत के राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया बल्कि एक विद्वान, दार्शनिक और भारत रत्न से सम्मानित भी थे। एक गरीब तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे राधाकृष्णन ने अपनी पूरी शिक्षा छात्रवृत्ति के माध्यम से पूरी की। उन्होंने दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की और 1917 में 'द फिलॉसफी ऑफ रवींद्रनाथ टैगोर' पुस्तक लिखी। उन्होंने 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति और 1939 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कुलपति के रूप में भी कार्य किया।

उन्होंने चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ाया। 1931 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1954 में भारत में सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार मिला। उन्हें 1963 में ब्रिटिश रॉयल ऑर्डर ऑफ मेरिट के मानद सदस्य के रूप में भर्ती हुए। डॉ. राधाकृष्णन अपने जीवनकाल के दौरान एक मेधावी छात्र, छात्रों के बीच एक प्रसिद्ध शिक्षक थे। ऐसा कहा जाता है कि जब वे 1962 में भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में सेवा कर रहे थे, तब उनके छात्रों ने उनके जन्मदिन 5 सितंबर को एक विशेष दिन के रूप में मनाने की अनुमति लेने के लिए उनसे संपर्क किया। इसके बजाय डॉ राधाकृष्णन ने समाज में शिक्षकों के योगदान को पहचानने के लिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का अनुरोध किया।

Teachers Day Special: इनोवेटिव टीचर...गांव देहात में कायाकल्प; ऐप, कोडिंग के जरिये शिक्षा की इबादत
World Largest Pen: हिमाचल के स्कूल में 20 फीट लंबा स्याही वाला पेन स्थापित, खूबियां जान कर हो जाओगे हैरान
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