हिंदुत्व कार्ड को विधान सभा चुनाव में कैसे फेस करेंगे अखिलेश यादव ?

वह भाजपा विरोधी और कांग्रेस विरोधी गैंग को जुटान करने में माहिर खिलाड़ी थे।
अखिलेश यादव

अखिलेश यादव

उत्तरप्रदेश विधान सभा चुनाव नजदीक है और हर राजनितिक पार्टी अपने दांव पेंच खेल रही है। कांग्रेस ने जयपुर में अपना हिंदुत्व कार्ड चला तो बीजेपी पार्टी अपनी अगली चाल की और अग्रसर है। वही समाजवादी पार्टी ने अपने वोटों को सहजने के लिए सारे दांव-पेंच चलने शुरू कर दिए हैं। जन - जन से जुड़ाव के लिए अखिलेश यादव भी मैदान में उत्तर गए है। और भाजपा ने अयोध्या, मथुरा के बाद काशी कॉरिडोर के बहाने जिस प्रकार से हिन्दुत्व की धार को तेज किया है, ऐसे में अखिलेश के सामने अपने चाचा की शरण में जाकर वोटों को बिखराव को रोकने की कवायद करनी पड़ी है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस गठबंधन से यादव वोटों की सपा और बसपा के लिए गोलबंदी तो होगी, साथ में शिवपाल यादव की राजनीतिक पार्टी भी मजबूत होगी अब देखना यह होगा की आखिर सपा कितनी टक्कर देती है आने वाले विधान सभा चुनाव में। मुलायम के बाद शिवपाल ही ऐसे व्यक्ति है जो कि संगठन की जमीनी पकड़ रखते हैं। वह भाजपा विरोधी और कांग्रेस विरोधी गैंग को जुटान करने में माहिर खिलाड़ी थे।

<div class="paragraphs"><p>अखिलेश यादव</p></div>

अखिलेश यादव

अखिलेश अपने वोटों के विभाजन को रोकने के लिए अपने चाचा शिवपाल के शरण में पहुंचे और गठबंधन की घोषणा कर दी है।

मुलायम जब अन्य संगठन के कार्यों में व्यस्त रहते थे, तब वो इनकी गोलबंदी करते थे। बताया जा रहा है कि शिवपाल यादव का पश्चिम उत्तर प्रदेश, अवध व बुंदेलखंड की कई दर्जन सीटों पर प्रभाव है। सपा के साथ आने से इन सीटों पर सपा को सीधे फायदा होगा। संगठन में भी उनकी पैठ है। साथ ही उनकी सहकारी समितियों में भी गहरी पकड़ है। इसका भी फायदा सपा को मिलेगा।

भाजपा ने भी 2022 के चुनाव के लिए अयोध्या में राममंदिर के बाद मथुरा की तान छेड़ रखी है। अभी हाल में प्रधानमंत्री ने काशी कॉरिडोर के लोकार्पण में गेरूआ वस्त्र धारण कर गले में रूद्राक्ष धारण किए हुए। गंगा स्नान और फिर हिन्दुत्व से ओत प्रोत भाषण कर पार्टी के लिए जमीन बनाने की बड़ी कोशिश की हैं जिसका संदेश बहुत दूर तलक गया है।

भाजपा के धार्मिक एजेंडे की मजबूती को देखते हुए वह एक बार अपने चाचा के दर पर पहुंचने को मजबूर हो गये।

इसी के बाद से अखिलेश अपने वोटों के विभाजन को रोकने के लिए अपने चाचा शिवपाल के शरण में पहुंचे और गठबंधन की घोषणा कर दी है।

सपा ने जातीय गोलबंदी के लिए छोटे-छोटे दलों से पूरब से लेकर पश्चिम तक गठबंधन रखा है। लेकिन फिर चाचा के अलग रहने से वोटों के बटवारे भय सता रहा था। उन्हें यह भी डर था कि चाचा के पार्टी में आने से कहीं एक बार फिर माहौल न बदल जाए। इसीलिए शिवपाल की बार-बार चेतावनी के बावजूद भी वह उनके पास नहीं जा पा रहे थे। लेकिन भाजपा के धार्मिक एजेंडे की मजबूती को देखते हुए वह एक बार अपने चाचा के दर पर पहुंचने को मजबूर हो गये।

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