Election Symbol: उद्धव गुट को 'मशाल', शिंदे को ‘दो तलवारें-ढाल’; महाराष्ट्र उपचुनाव में कौन करेगा धमाल?

शिवसेना के दोनों गुटों (उद्धव-शिंदे) को नया नाम और नए चुनाव चिह्न आवंटित हो चुके है। 3 नवंबर को महाराष्ट्र की अंधेरी पूर्व विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। अब देखना यह है कि नए नाम और नए चुनाव चिह्न के साथ उपचुनाव में कौन सा गुट बाजी मारता है।
Election Symbol: उद्धव गुट को 'मशाल', शिंदे को ‘दो तलवारें-ढाल’; महाराष्ट्र उपचुनाव में कौन करेगा धमाल?

महाराष्ट्र में अंधेरी पूर्व विधानसभा सीट पर 3 नवंबर को उपचुनाव होने वाले हैं। इसके लिए दो धड़ों में बंट चुकी शिवसेना के उद्धव और शिंदे गुट को चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं। साथ ही दोनों गुटों को नया नाम भी मिल गया है। उद्धव गुट की शिवसेना का नया नाम शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे मिला है। वहीं, शिंदे गुट की शिवसेना को चुनाव आयोग ने बालासाहेबची शिवसेना नाम आवंटित किया है। उद्धव गुट को पार्टी चुनाव चिह्न 'मशाल' मिला है, जबकि शिंदे गुट को ‘दो तलवारें-ढाल’ आवंटित हुआ है। अब देखना यह है कि नए नाम और चुनाव चिह्न के साथ उपचुनाव में कौन बाजी मारता है।

शिवसेना में एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद लगभग 33 साल बाद ऐसा हुआ है कि जब पार्टी का 'धनुष बाण' निशान फ्रीज कर दिया गया है। इसके अलावा चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को शिवसेना नाम का इस्तेमाल करने से भी रोका है।

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को ये नाम और निशान क्यों दिया?

तीन नवंबर को महाराष्ट्र के अंधेरी ईस्ट विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। इस सीट से अब तक शिवसेना के रमेश लटके विधायक थे। रमेश अपने परिवार के साथ दुबई गए थे, जहां दिल का दौरा पड़ने के कारण 12 मई को उनका निधन हो गया। चुनाव आयोग ने तीन नवंबर को यहां उपचुनाव कराने का फैसला लिया है। इसके लिए शिंदे गुट और भाजपा ने मिलकर यहां से पूर्व पार्षद मुरजी पटेल को अपना संयुक्त उम्मीदवार बनाया है। पटेल के सामने उद्धव गुट का उम्मीदवार भी होगा। उद्धव गुट को कांग्रेस, एनसीपी का भी समर्थन मिला है।

उद्धव ठाकरे के हटने और शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पहला चुनाव है। ऐसे में दोनों गुटों के लिए ये चुनाव किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। इस चुनाव में दोनों गुट आमने सामने होंगे। इसे लेकर दोनों गुटों ने शिवसेना के नाम और चुनाव निशान पर अपना दावा चुनाव आयोग में पेश किया था। इसी को देखते हुए चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों फ्रीज करके दोनों गुटों से तीन-तीन वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न मांगे थे।

जानें उद्धव गुट को क्यों मिला मशाल चुनाव चिह्न?

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से कहा कि वे उपचुनावों के लिए अधिसूचित फ्री सिंबल की लिस्ट से अलग-अलग चुनाव चिह्न चुनें और दस तारीख तक बता दें। इसके बाद उद्धव गुट ने त्रिशूल, उगता सूरज और मशाल चुनाव चिह्न विकल्प के रूप में दिए थे। इनमें से उद्धव गुट को मशाल चुनाव चिह्न मिल गया। उद्धव गुट को 'त्रिशूल' का चिह्न इसलिए नहीं मिला क्योंकि इसका धार्मिक संकेत है। 'उगता सूरज' इसलिए नहीं मिला क्योंकि यह तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक के पास है। 'मशाल' चुनाव चिह्न 2004 तक समता पार्टी के पास था। उसके बाद से यह किसी को आवंटित नहीं था, इसलिए यह चिह्न उद्धव गुट को दिया गया है।

शिंदे गुट का कैसे मिला ‘दो तलवारें-ढाल’?

निर्वाचन आयोग ने सोमवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले धड़े की ओर से शुरुआत में सौंपी गई चुनाव चिह्न की लिस्ट को खारिज कर दिया था. शिंदे गुट ने गदा, उगता सूरज और त्रिशूल में से कोई एक चिह्न मांगा था। गदा और त्रिशूल के धार्मिक संकेत होने के चलते दोनों चुनाव निशान शिंदे गुट को नहीं मिले। वहीं, उगता सूरज द्रमुक का चुनाव निशान होने के कारण नहीं मिला। इसके बाद शिंदे गुट ने ‘बालासाहेबंची शिवसेना’ के लिए अपने पंसद के तीन नए चुनाव चिह्नों की लिस्ट मंगलवार को निर्वाचन आयोग (ईसी) को सौंपी, जिसमें पीपल का वृक्ष, दो तलवार और ढाल तथा सूरज शामिल था. इसमें से चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ‘दो तलवारें और ढाल’ चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया।

इस प्रकार मिले दोनों गुटों को नाम

दोनों गुट ने अपने पहले वैकल्पिक नाम के तौर पर शिवसेना (बालासाहेब ठाकरे) नाम दिया था। इस वजह से यह नाम दोनों ही गुटों को यह नाम नहीं मिला। इसके साथ ही उद्धव गुट के विकल्प में पार्टी के नाम के रूप में दूसरा विकल्प शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम था। इसे उद्धव गुट को आवंटित कर दिया गया। इसी तरह शिंदे गुट के विकल्प में दूसरा विकल्प बालासाहेबची शिवसेना नाम शिंदे गुट को आवंटित कर दिया गया।

'मशाल' से शिवसेना का पुराना रिश्ता, जानें पूरा वाकिया

आपको जानकर हैरान होगी की यह पहली बार नहीं है जब शिवसेना मशाल चुनाव निशान पर चुनाव लड़ रही है। इससे पहले 1985 में भी शिवसेना को यही निशान दिया गया था और उसे सफलता भी मिली थी। छगन भुजबल ने तब मजगांव से मशाल के निशान पर चुनाव जीता था। बाद में भुजबल ने विद्रोह कर दिया और वे कांग्रेस में चले गए। छगन भुजबल इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हैं।

शिवसेना ने निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव के वक्त मशाल चुनाव निशान का इस्तेमाल किया था। बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना का गठन तो कर दिया था लेकिन स्थायी चुनाव निशान मिलने में 23 साल लग गए। 1989 में शिवसेना को राज्य स्तर की पार्टी का दर्जा दिया गया। इसके बाद ही पार्टी को एक स्थाई चुनाव निशान रखने की अनुमति मिली।

शिवसेना के सांसद गजानन कीर्तिकर ने बताया 1967-68 में पहली बार पार्टी ने स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ा था। तब अधिकतर प्रत्याशियों को 'तलवार और ढाल' का निशान मिला था। वहीं 1985 में ज्यादातर प्रत्याशियों को 'मशाल' चुनाव निशान मिला था। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे पर कई किताबें लिखने वाले योगेंद्र ठाकुर ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता मधुकर सारपोतदार ने 1985 में केरवाड़ी विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ा था। बाल ठाकरे ने उनके लिए प्रचार भी किया था। उस वक्त मंच के किनारे मशाल जलाकर रखी गई थी ताकि लोगों को पता चल जाए कि किस निशान को देखकर वोट देना है।

1985 में जब महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव हुआ तो कुछ प्रत्याशियों को मशाल चुनाव निशान मिला था। वहीं कई उम्मीदवारों को बैट, सूरज, कप और तश्तरी निशान मिला था। छगन भुजबल ऐसे ही प्रत्याशी में से एक थे जिन्हें मशानलल चुनाव निशान दिया गया था। वहीं 1970 में उपचुनावके दौरान शिवसेना नेता ने उगता हुआ सूरज पर चुनाव लड़ा और सफलता हासिल की। बाद में 1988 में चुनाव निशान ने फैसला किया कि राजनीतिक पार्टियों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

शिवसेना नेता सुभाष देसाई, ऐडवोकेट बाल कृष्ण जोशी की अगुआई में शिवसेना के रजिस्ट्रेशन के लिए दस्तावेज पेश किए गए। इसके बाद ही शिवसेना को धनुष बाण का निशान मिला। इसके बाद से अब तक शिवसेना नेता इसी निशान पर चुनाव लड़ रहे थे।

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