जानें क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड, क्यों सुप्रीम कोर्ट ने लगाई इस पर रोक

इलेक्टोरल बॉन्ड एक वचन पत्र की तरह है जिसकी खरीदारी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से किसी कंपनी या नागरिक की ओर से की जा सकती है। इनकी अवधि केवल 10 दिनों की होती है। इसका इस्तेमाल सिर्फ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता है।
जानें क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड,क्यों सुप्रीम कोर्ट ने लगाई इस पर रोक
जानें क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड,क्यों सुप्रीम कोर्ट ने लगाई इस पर रोक

इलेक्टोरल बॉन्ड एक वचन पत्र की तरह है जिसकी खरीदारी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से किसी कंपनी या नागरिक की ओर से की जा सकती है।

इनकी अवधि केवल 10 दिनों की होती है। इसका इस्तेमाल सिर्फ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता है, लेकिन ये केवल उन्हीं राजनीतिक दलों को दिया जाता है।

जिन्होनें पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम एक प्रतिशत वोट हासिल किए हो।

ये दान गुमनाम तरीके से किया जाता है। इन बॉन्ड को ऐसा कोई भी व्यक्ति खरीद सकता जिसके पास एक बैंक अकाउंट और केवाईसी उपलब्ध हो।

इसके तहत व्यक्ति शाखाओं से 1000 रुपये से लेकर 1 करोड़ तक अपनी पसंदीदा पार्टी को दान कर सकता है। इस योजना के तहत चुनावी बॉन्ड जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीनों में 10 दिनों की खरीद के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं।

इन्हें लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के दौरान भी जारी किया जा सकता है

चुनावी बॉन्ड का क्या था मकसद

चुनावी बॉन्ड का फाइनेंशियल बिल 2017 में पेश किया गया था। 29 जनवरी, 2018 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को अधिसूचित किया था। उसी दिन से इसकी शुरुआत हुई।

जब इसकी शुरुआत की गई थी ,सरकार ने दावा किया था इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता रहेगी। इस बांड के जरिए पसंदीदा पार्टी को दान दिया जा सकता था।

चुनावी बॉन्ड पर क्यों हुआ विवाद

चुनावी बांड्स पर कांग्रेस नेता जया ठाकुर, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) समेत चार लोगों ने याचिकाएं दाखिल की।

उनका कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए गुपचुप फंडिंग में पारदर्शिता को प्रभावित करती है और ये सीधा-सीधा सूचना के अधिकार का उल्लंघन है।

इस पर सुनवाई 31 अक्टूबर ,2023 में शुरू कि गई थी। सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक पक्ष विपक्ष दोनों की दलीलों को सुना और फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनावी बॉन्‍ड योजना को रद्द कर दिया जाए।

शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि "काले धन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सूचना के अधिकार का उल्लंघन उचित नहीं है।

चुनावी बॉन्ड योजना सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन है। राजनीतिक दलों के द्वारा फंडिंग की जानकारी उजागर न करना उद्देश्य के विपरीत है।"

31 मार्च तक शेयर करें डाटा

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्‍ड को तुरंत प्रभाव से रोकने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई ) से जितने भी चुनावी बॉन्‍ड लिए गए है।

उनका डाटा शेयर करने की अंतिम तारीख 31 मार्च दी है। साथ ही कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह 13 अप्रैल तक अपनी वेबसाइट पर इसकी जानकारी शेयर करें।

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