राम मंदिर पर बलिदान होने वाले राजस्थानी कारसेवक, कोठारी भाइयों ने ढ़ाचे पर फहराया था भगवा पताका

Ram Mandier: अयोध्या में राममंदिर बनने की खुशी संपूर्ण देश मना रहा है। 22 जनवरी को रामलला अपने भव्य राम मंदिर में विराजने वाले हैं। इसको लेकर तैयारियां जोरो से चल रही है।
राम मंदिर पर बलिदान होने वाले राजस्थानी कारसेवक, कोठारी भाइयों ने ढ़ाचे पर फहराया था भगवा पताका
राम मंदिर पर बलिदान होने वाले राजस्थानी कारसेवक, कोठारी भाइयों ने ढ़ाचे पर फहराया था भगवा पताका

Ram Mandier: अयोध्या में राममंदिर बनने की खुशी संपूर्ण देश मना रहा है। 22 जनवरी को रामलला अपने भव्य राम मंदिर में विराजने वाले हैं।

इसको लेकर तैयारियां जोरो से चल रही है। लेकिन इस राम मंदिर के निर्माण में कारसेवकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

हम आपको राजस्थान के 5 ऐसे कारसेवकों का बलिदान बता रहे जिसमें जब भी राम मंदिर का नाम आएगा तो  इनको जरुर याद किया जाएगा।

जांघ में पुलिस की गोली लगी, राम पथ पर हो गए बलिदान

आशा आरोड़ा जो महेंद्र सिंह की बहन है, वो बताती है की महेन्द्र सिंह मेरे भाई हैं। जोधपुर यूनिवर्सिटी में यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। अयोध्या जाने से पहले वह मेरे घर आए और खूब बातें कीं।

जोधपुर से बस से फैजाबाद गए थे। उनके साथ डागा साहब  भी गए थे, जो उन्हें देश भक्ति की कविताएं सुनाते हुए गए थे। वहां पहुंचने में उन्हें रात हो गई। ऐसे में महेन्द्र सिंह समेत तीन-चार जने वहां खेत में बनी झोंपड़ी में पहुंचे।

किसानों ने उन्हें रात्रि को यहां ठहराया और सुबह काबुली चने खिलाए। लेकिन सरकार मंदिर स्थल तक लोगों को पहुंचने नहीं दे रही थी। पर महेंद्र सिंह निकल पड़े। इसी दौरान वहां की सरकार ने गोलियां चलवा दीं। महेन्द्र सिंह की जांघ में गोली लगी, अत्यधिक रक्तस्राव से उनका व एक अन्य का बलिदान हुआ था। ये जोधपुर के रहने वाले थे।

ढ़ाचे पर भगवा फैलाने वाले कोठारी बंधु

पुनम कोठोरी ने कहा शरद कोठारी और राम कुमार कोठारी मेरे भाई हैं। दोनों को धर्म की ऐसी धुन थी कि खुशी-खुशी अयोध्या में कारसेवा में शामिल होने गए थे। 6 दिसम्बर 1992 को कारसेवा के दौरान फायरिंग और लाठीचार्ज से हालात ऐसे बने कि मेरे दोनों भाइयों की जान चली गई। लेकिन अब मंदिर तैयार होने पर लगता है उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुझे मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा में आने के लिए निमंत्रण पत्र भेजा है। मेरे दोनों बड़े भाई आज दुनिया में नहीं है, लेकिन वे अजर-अमर हो गए हैं। बस इस बात का अफसोस है कि हमारे माता-पिता आज जीवित नहीं है। अन्यथा वे बेटों की बलिदान भूमि पर मंदिर के दर्शन करते।

खुद घायल लेकिन दूसरे कारसवकों को बचाने के लिए दिया बलिदान

मां अक्षय देवी ने बताया कि 28 नवम्बर 1992 को अजमेर से जितेंद्र बहल की अगुवाई वाले जत्थे में अविनाश अयोध्या कारसेवा के लिए गया था। वह 30 नवम्बर को वहां पहुंच गया। 6 दिसम्बर को कारसेवा शुरू हुई तो वह उसमें शामिल हुआ। इसी दौरान शाम को अयोध्या के टेढ़ा बाजार में कुछ असामाजिक तत्वों ने कारसेवकों पर पेट्रोल बम फेंक दिया।

यह बम अविनाश के पास फटा तो वह घायल हो गए और भी कई लोग घायल थे। लेकिन अविनाश और उसके साथी अपने जख्मों को छोड़कर अन्य घायलों की देखभाल और चिकित्सा व्यवस्था में जुट गए। बाद में अविनाश की मृत्यु हो गई। 8 दिसम्बर 1992 को जयपुर रोड बाइपास पर अविनाश का शव पहुंचा। मुझे बेटे की मौत की खबर तक नहीं थी। जब उसका शव घर पर आया... तब वज्रपात हुआ।

अंतिम शब्द शहीद भगत सिंह जैसे वीर पूछकर नहीं जाते

जोधपुर जिले के मथानिया के सेठाराम परिहार उन लोगों में से हैं, जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी। आंदोलन के दौरान जब उनका अयोध्या में निधन हुआ, तब तक अस्थमा से पीड़ित पिता बंशीलाल को पता तक ही नहीं था कि बेटा भी अयोध्या में है। कारसेवकों के जत्थे के रवाना होने से पहले हुई बैठक में सेठाराम से जब पूछा गया कि क्या वे घर बताकर आए हैं, तो उन्होंने कहा- शहीद भगत सिंह जैसे वीर पूछकर नहीं जाते। उनके बेटे मुकेश बताते हैं कि जब मैं छह साल का हुआ, तब कार्तिक पूर्णिमा को गांव में पिता की स्मृति में होने वाले कार्यक्रम में मंच पर मुझे माला पहनाई गई। तब पता चला कि अयोध्या राम मंदिर निर्माण के लिए पिता ने अपना बलिदान दिया था। हर कार्तिक पूर्णिमा पर पिता की स्मृति में गांव में मेला भरता है। उनकी गांव के मध्य प्रतिमा भी लगाई गई है।

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