इन एप्स से देखते है फिल्म तो हो जाइए सावधान! पर्सनल लाइफ को हो सकता है खतरा

इन एप्स से देखते है फिल्म तो हो जाइए सावधान! पर्सनल लाइफ को हो सकता है खतरा

आजकल देश में पाइरेसी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। Google Play Store पर Picshow, Momix, Popcorn Flix जैसे ऐप्स मौजूद है जो नेटफ्लिक्स और अमेज़ॅन जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से मूल सामग्री चुरा कर ग्राहकों को मुफ्त में दिखा रहे हैं।

आजकल देश में पाइरेसी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। Google Play Store पर Picshow, Momix, Popcorn Flix जैसे ऐप्स मौजूद है जो नेटफ्लिक्स और अमेज़ॅन जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से मूल सामग्री चुरा कर ग्राहकों को मुफ्त में दिखा रहे हैं। देश के बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म पर शो के लॉन्च होने के चंद घंटों के अंदर ही पूरा शो इन्हीं पायरेटेड एप्स पर आ जाता है। इन ऐप्स को व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से भी बढ़ावा मिलता है।

क्या है पाइरेसी

किसी भी मूवी, शो या वेब सीरीज की नकल कर उसे अवैध तरीके से प्रसारित करना ही पाइरेसी कहलाती है। आसान शब्दों में कहें तो चोरी का माल फ्री में बैचना ही पाइरेसी है।

अमेजन प्राइम, नेटफ्लिक्स और अन्य प्लेटफॉर्म की मूवीज़ या वेब सीरीज को दूसरे एप्स के माध्यम से फ्री में देखना इसका एख उदाहरण है।

पाइरेटेड एप्स के यूज से बढ़ चोरी हो रहा यूजर का पर्सनल डेटा
फ्री में लेटेस्ट मूवी या वेबसीरीज देखने के लालच यूजर्स को खतरे में डाल सकता है। ये एप्स दूसरे देशों के द्वारा चलाए जा रहै है। इनके इस्तेमाल से यूजर्स के पर्सनल डेटा चोरी होने का खतरा होता है। साइबर सेल को भी इसकी जानकारी है, लेकिन यह पहुंच से बाहर है।

ये एप्स दे रहे पायरेसी का माल मुफ्त में

मौजूदा समय की बात करें तो पिकशो, मोमिक्स, पॉपकॉर्न फ्लिक्स, मोबड्रो, कोडी, पॉपकॉर्न टाइम, मूवी HD, थोप टीवी, फ्लिक्स प्ले, T टीवी, मिस्टर टीवी, मूवी बॉक्स, एचडी सिनेमा और ऐसे ही कई और ऐप है जो मार्केट में पिछले 2 से 3 साल से धड़ल्ले से वीडियो और लाइव टीवी के प्रीमियम कंटेंट चोरी कर बेच रहे हैं। ये एप्स गूगल प्ले स्टोर पर भी उपलब्ध है।

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ग्राहकों से वसूल रहे चार्ज

मार्केट में कुछ ऐसे फेमस पाइरेटेड ऐसे एप्स भी है जो अपने ग्राहकों से चार्ज वसूल रहें है। बताया जा रहा है कि महीनें में करीब 30 से 50 रुपए में ये एप्स पाइरेटेड माल ग्राहकों को बैच रहै है।

इस एप्स की खास बात ये है कि इन पर सब्सक्राइबर बेस भी कुछ ओरिजिनल OTT प्लेटफॉर्म से ज्यादा है। इसका फायदा उठाते हुए कुछ ने चोरी किए हुए कंटेंट को दिखाने के लिए पैसे लेना शुरू कर दिया है। ये एप्स लगभग पिछले 2-3 सालों से खुलेआम चोरी का माल फ्री में उपलब्ध करवा रहे है।

टेलीग्राम, फैसबुक से मिल रहा बढ़ावा

साइबर सेल का कहना है कि वे इन पाइरेटेड ऐप्स की जानकारी होने के बावजूद वे उन्हें ब्लॉक नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कई बार गूगल, फेसबुक और ट्विटर को इसकी जानकारी दी है, लेकिन उनकी ओर से लगभग हमेशा देर से या कभी-कभी रिस्पॉन्स ही नहीं आता है।

ऐसे में वह इस पर समय-समय पर कानूनी कार्रवाई करते रहते हैं, लेकिन आज भी सिर्फ एक क्लिक में हम इन ऐप्स को गूगल, फेसबुक, टेलीग्राम और अन्य सर्च प्लेटफॉर्म पर खोज सकते हैं। और इन प्लेटफार्म के माध्यम से इन एप्स को बढ़ावा मिल रहा है।

पाइरेटेड एप्स से बढ़ रहा टेरर फंडिंग का खतरा
सूत्रों की माने तो वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विसेज देने वाले इंडियन OTT प्लेटफॉर्म को हर साल 30%-35% रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है। सुरक्षा एजेंसीज का अंदेशा है कि इन पैसों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ टेरर फंडिंग के लिए भी किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि 1993 ब्लास्ट का आरोपी दाऊद इब्राहिम भी कई सालों तक फिल्मों की पाइरेसी करता था, वही वर्तमान में दाऊद गैंग से जुड़े लोग OTT कंटेंट की पाइरेसी से जुड़ गए हैं और हर साल हजारों करोड़ रुपए जमा कर रहे हैं।

पाइरेसी के मामले में तीसरे नंबंर पर भारत

साइबर सुरक्षा और क्लाउड सर्विस कंपनी ‘अकामाई टेक्नोलॉजीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में भारत, अमेरिका और रुस के बाद पाइरेटेड ऐप और वेबसाइट्स का इस्तेमाल करने में तीसरें नंबंर पर है। भारत में 20121 में पाइरेटेड वेबसाइट्स पर 6.5 अरब विज़िट दर्ज की गईं थी, जो अमेरिका (13.5 बिलियन) और रूस (7.2 बिलियन) के बाद तीसरी सबसे विजिट ज्यादा थी।

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साइबर क्रिमिनल को पकड़ना मुश्किल पर नामुमकिन नहीं

इस मामले पर महाराष्ट्र साइबर क्राइम सेल के DCP संजय शिंत्रे का कहना है कि साइबर क्रिमिनल को पकड़ना बहुत मुश्किल होता है लेकिन साइबर क्रिमिनल्स हमेशा कुछ फुटप्रिंट छोड़ देते हैं। और इन्ही सबूतों के माध्यम से पुलिस उन्हें पकड़ लेती है।

आगे उन्होंने बताया कि अगर ये ऐप भारत से संचालित हो रहे हैं तो वे जल्द हमारी गिरफ्त में आ जाते हैं, लेकिन बाहर देश से संचालित हो रहे ऐप में अपराधी को पकड़ना मुश्किल होता है क्योंकि हमें यह देखना होता है कि उस देश से हमारी संधि है या नहीं।

जिन देशों से हमारी संधि नहीं होती है उन देशों में जाकर क्रिमिनल को कानूनी रुप से गिरफ्तार करने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन वह सलाखों के पीछे जरूर पहुंचता है।

विदेशो से संचालित हो रहे एप्स पर कार्रवाई करना होता है मुश्किल
विशेषज्ञों की माने तो ऐप पाइरेसी को लेकर हमारे देश में कड़ा कानून मौजूद है, लेकिन ऐप के स्क्रिप्ट (कोड) में थोड़ा सा बदलाव करके पाइरेटेड ऐप बनाने वाले आसानी से बच निकलते हैं। बताया जा रहा है कि अगर कोई हमारे देश में वीडियो या लाइव कंटेंट की पाइरेसी करता है तो उसे सजा मिलना तय है, साथ ही उन एप्स को बंद भी करवाया जाता है। लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत उन ऐप्स को बंद करवाने में आती है जो भारत की जगह विदेश से संचालित हो रहे होते हैं। इन ऐप्स को बंद करवाना लगभग असंभव है।
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